पश्चिम बंगाल की 39 वर्षीय आदिवासी महिला, Bhadu Mandi को गुरुग्राम में DLF Garden City के एक घर में दो साल से अधिक समय तक काम करने के बाद बंधुआ मजदूरी की स्थिति से बचाया गया। उसे ₹40,000 के अग्रिम भुगतान के साथ घरेलू काम के लिए दिल्ली लाया गया था। उसकी बहन, Lakshmi Tudu ने बताया कि Ms. Mandi को स्मार्ट लॉकिंग सिस्टम द्वारा प्रतिबंधित किया गया था, वह प्रतिदिन 16 घंटे से अधिक काम करती थी, और शारीरिक शोषण का शिकार थी। यह मामला मार्च में सामने आया, 4 जून को एक FIR दर्ज की गई, और हरियाणा और पश्चिम बंगाल पुलिस, जिला प्रशासन और नागरिक समाज के सदस्यों के एक संयुक्त अभियान से उसे बचाया गया।
- पश्चिम बंगाल की एक आदिवासी महिला को गुरुग्राम में बंधुआ मजदूरी से बचाया गया।
- उसे दो साल से अधिक समय तक प्रतिबंधित आवाजाही, लंबे समय तक काम करने और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा।
- यह बचाव पुलिस, जिला प्रशासन और एक NGO सहित एक संयुक्त अभियान का परिणाम था।
Association of Victims of Uphaar Tragedy (AVUT) ने 1997 के Uphaar सिनेमा हॉल अग्निकांड के 29 साल पूरे होने पर दुख व्यक्त किया कि दिल्ली में अग्नि सुरक्षा के सबक अभी भी नहीं सीखे गए हैं। AVUT की अध्यक्ष Neelam Krishnamoorthy ने बार-बार होने वाली आग की घटनाओं को अनदेखी की गई सुरक्षा उल्लंघनों और खराब तरीके से जांचे गए No Objection Certificates के प्रमाण के रूप में उजागर किया। एसोसिएशन ने मौतों का कारण बनने वाली लापरवाही के लिए कड़ी जवाबदेही की मांग की और सुरक्षा उल्लंघनों को नियंत्रित करने वाले कानून की वकालत की, इस बात पर जोर दिया कि जब अनुपालन खरीदा जाता है और जवाबदेही से बचा जाता है तो सार्वजनिक सुरक्षा को नुकसान होता है।
- AVUT ने Uphaar सिनेमा त्रासदी के 29 साल पूरे होने पर अग्नि सुरक्षा सुधारों की कमी की आलोचना की।
- दिल्ली में बार-बार होने वाली आग की घटनाएं लगातार सुरक्षा उल्लंघनों और NOCs की अपर्याप्त जांच का संकेत देती हैं।
- एसोसिएशन मौतों का कारण बनने वाली लापरवाही के लिए कड़ी जवाबदेही की मांग करता है।
दलित धर्मांतरितों के लिए Scheduled Caste (SC) स्थिति के मुद्दे की जांच करने के लिए गठित न्यायमूर्ति K.G. Balakrishnan (सेवानिवृत्त) आयोग ने लगभग चार साल और कई विस्तार के बाद अपनी रिपोर्ट पूरी कर ली है। तीन सदस्यीय आयोग का गठन अक्टूबर 2022 में दलित मुसलमानों और ईसाइयों के लिए SC स्थिति की मांग, इस मांग के विरोध और मौजूदा SC समुदायों पर इसके प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया गया था। वर्तमान में, केवल हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के दलितों को SC वर्गीकरण का अधिकार है। केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इस्लाम और ईसाई धर्म में धर्मांतरितों को SC स्थिति प्रदान करने का लगातार विरोध किया है।
- न्यायमूर्ति K.G. Balakrishnan आयोग ने दलित धर्मांतरितों को Scheduled Caste का दर्जा देने पर अपनी रिपोर्ट पूरी कर ली है।
- आयोग का गठन अक्टूबर 2022 में दलित मुसलमानों और ईसाइयों के लिए SC स्थिति की मांग की जांच के लिए किया गया था।
- वर्तमान में, SC स्थिति हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के दलितों तक सीमित है।
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के नामांकन की अस्वीकृति ने संस्थागत अखंडता और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के बारे में सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके नामांकन को Returning Officer (RO) द्वारा एक लंबित आपराधिक मामले का खुलासा करने में कथित विफलता के लिए खारिज कर दिया गया था, जो एक निजी शिकायत थी, न कि एक पारंपरिक पुलिस मामला, और सीधे उनके खिलाफ नहीं था। आलोचकों का तर्क है कि RO का निर्णय मनमाना है और Representation of the People Act के Section 33A की गलत व्याख्या है, जिसके लिए केवल उन मामलों में खुलासे की आवश्यकता होती है जिनमें दो साल या उससे अधिक की संभावित सजा हो और आरोप तय किए गए हों। इस घटना को लोकतंत्र और चुनाव की अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है।
- कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा के लिए नामांकन एक लंबित आपराधिक मामले का खुलासा न करने के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
- आपराधिक मामला एक निजी शिकायत थी, न कि पुलिस FIR, और सीधे सुश्री नटराजन के खिलाफ नहीं थी।
- आलोचकों का तर्क है कि अस्वीकृति मनमानी है और Representation of the People Act के Section 33A की गलत व्याख्या करती है।
लोकसभा में पेश किया गया Foreign Contribution (Regulation) Amendment (FCRA) Bill, 2026, NGOs, धर्मार्थ ट्रस्टों और शैक्षिक/धार्मिक संस्थानों पर राज्य नियंत्रण के महत्वपूर्ण विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का तर्क है कि यह पारदर्शिता से परे जाकर कार्यकारी को संपत्ति जब्त करने में सक्षम बनाता है, विशेष रूप से Section 16A के माध्यम से, जो FCRA पंजीकरण रद्द होने या समाप्त होने पर बिना किसी पूर्व न्यायिक समीक्षा के सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण में संपत्ति के "अनंतिम निहित" होने की अनुमति देता है। यह संगठनों, विशेष रूप से कमजोर समुदायों और अल्पसंख्यकों की सेवा करने वालों के अस्तित्व को खतरे में डालता है, और स्वतंत्रता के अधिकार जैसे संवैधानिक अधिकारों और संपत्ति के अधिकारों को कमजोर करने के बारे में चिंताएं बढ़ाता है।
- FCRA Bill, 2026, नागरिक समाज संगठनों पर कार्यकारी शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि करता है।
- Section 16A किसी संगठन की संपत्ति को सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण में अनंतिम रूप से निहित करने की अनुमति देता है यदि उसका FCRA पंजीकरण रद्द कर दिया जाता है या समाप्त हो जाता है।
- इस विधेयक की आलोचना न्यायिक समीक्षा के बिना संपत्ति की जब्ती का कारण बनने और कमजोर समुदायों और अल्पसंख्यकों की सेवा करने वाले संगठनों को प्रभावित करने की क्षमता के लिए की जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के Article 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के तहत एक दोषसिद्धि को पलटने के लिए किया। यह निर्णय ऐसे मामले में लिया गया था जहाँ घटना के समय नाबालिग रही पीड़िता ने बाद में वयस्क होने पर आरोपी से शादी कर ली थी। अदालत ने जोर दिया कि Article 142 उसे "पूर्ण न्याय" सुनिश्चित करने की अनुमति देता है जब मौजूदा कानून अपर्याप्त हों, जिससे युगल को पति-पत्नी के रूप में शांति से रहने में मदद मिली।
- सर्वोच्च न्यायालय ने POCSO दोषसिद्धि को रद्द करने के लिए Article 142 का उपयोग किया।
- यह निर्णय इस तथ्य पर आधारित था कि पीड़िता और आरोपी ने बाद में वयस्क होने पर शादी कर ली थी।
- Article 142 सर्वोच्च न्यायालय को "पूर्ण न्याय" प्रदान करने की शक्ति प्रदान करता है जहाँ कानून अपर्याप्त हों।
चुनावी रोल के Special Intensive Revision (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट का 27 मई, 2026 का फैसला Election Commission of India (ECI) की शक्तियों और आचरण के संबंध में महत्वपूर्ण बहस का विषय बन गया है। याचिकाकर्ताओं की SIR के बिहार में, 2025 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, कार्यान्वयन को लेकर चिंताओं के बावजूद, कोर्ट ने ECI के सभी तर्कों को बरकरार रखा। आलोचकों का तर्क है कि SIR कानून के गलत प्रावधान (RP Act, 1950 की धारा 21(2) के बजाय 21(3)) के तहत आयोजित किया गया था, जिससे लाखों मतदाताओं को उचित निवारण के बिना हटा दिया गया। इस फैसले से ECI को नागरिकता दस्तावेजों का निर्धारण करने का व्यापक अधिकार भी मिलता है, एक ऐसी भूमिका जो आमतौर पर Home Ministry की होती है, जिससे इसके संवैधानिक जनादेश पर सवाल उठते हैं।
- बिहार में चुनावी रोल के Special Intensive Revision (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ECI की शक्तियों और वैधानिक प्रावधानों के पालन के बारे में सवाल उठाए हैं।
- आलोचकों का तर्क है कि SIR को एक गलत कानूनी प्रावधान, RP Act, 1950 की धारा 21(3) के तहत लागू किया गया था, जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में विशेष संशोधन के लिए है, न कि पूरे राज्य में गहन संशोधन के लिए।
- चुनावी रोल के उद्देश्यों के लिए नागरिकता दस्तावेजों का निर्धारण करने के लिए ECI को फैसले द्वारा दी गई अनुमति को Home Ministry के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने के लिए एक Presidential Ordinance को स्वीकार करना, जिसके परिणामस्वरूप पांच नए न्यायाधीशों (तीन नव निर्मित पदों पर) की नियुक्ति हुई, न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यकाल की सुरक्षा के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। लेख ऐतिहासिक उदाहरणों, जैसे President Roosevelt के court-packing plan, से समानताएं खींचता है, जिन्हें एक स्वतंत्र न्यायपालिका को बनाए रखने के लिए अस्वीकार कर दिया गया था। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि एक Ordinance की अस्थायी प्रकृति और संसद द्वारा इसके lapse या अस्वीकृति की संभावना इसके तहत नियुक्त न्यायाधीशों के कार्यकाल को अनिश्चित बना सकती है, संभावित रूप से कार्यपालिका के प्रति एक दायित्व पैदा कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं पहले repromulgated ordinances द्वारा शासन के खिलाफ फैसला सुनाया है, इसे 'संविधान पर एक धोखाधड़ी' कहा है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 न्यायाधीश करने के लिए एक Presidential Ordinance को स्वीकार किया, जिससे नव निर्मित पदों पर नियुक्तियां हुईं।
- यह कदम न्यायिक स्वतंत्रता और एक अस्थायी Ordinance के माध्यम से नियुक्त न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा के बारे में चिंताएं बढ़ाता है।
- ऐतिहासिक रूप से, राजनीतिक कारणों से अदालत की संरचना को बदलने के प्रयासों, जैसे Roosevelt के court-packing plan, का न्यायिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए विरोध किया गया है।
Supreme Court ने हाल ही में भारत के रियल-मनी ऑनलाइन गेमिंग उद्योग को प्रभावित करने वाले दो महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। इसने रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म को प्रतिबंधित करने वाले राज्य कानूनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, यह दावा करते हुए कि सट्टेबाजी और जुआ 'res extra commercium' हैं और राज्य की विधायी क्षमता (Entry 34, List II) के अंतर्गत आते हैं। अदालत ने ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर केंद्र के पूर्वव्यापी (retrospective) 28% GST लेवी की भी पुष्टि की, यह स्पष्ट करते हुए कि GST दांव के पूर्ण मूल्य पर लागू होता है, चाहे खेल कौशल-आधारित हों या संयोग-आधारित। फैसले इस बात पर जोर देते हैं कि एक बार अनिश्चित परिणाम पर पैसा दांव पर लग जाने के बाद, GST उद्देश्यों के लिए कौशल और संयोग के बीच का अंतर अप्रासंगिक हो जाता है। इन फैसलों के उद्योग के लिए गंभीर निहितार्थ हैं, कई कंपनियां दिवालियापन और संचालन में संभावित बदलाव का सामना कर रही हैं।
- Supreme Court ने रियल-मनी ऑनलाइन गेमिंग को प्रतिबंधित करने वाले राज्य कानूनों को बरकरार रखा, सट्टेबाजी और जुए को 'res extra commercium' के रूप में वर्गीकृत किया।
- अदालत ने पुष्टि की कि राज्य सरकारों के पास List II की Entry 34 के तहत ऐसी गतिविधियों को विनियमित करने की विधायी क्षमता है।
- ऑनलाइन गेमिंग पर केंद्र के पूर्वव्यापी 28% GST लेवी को बरकरार रखा गया, जो दांव के पूर्ण मूल्य पर लागू होता है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में तमिलनाडु के Thoothukudi में Sterlite Copper संयंत्र के बंद होने के संबंध में 'राष्ट्रीय हित' का आह्वान किया, और इसके बंद होने के पीछे एक साजिश का सुझाव दिया। 2018 में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस फायरिंग और पर्यावरणीय उल्लंघनों के बाद आठ साल से बंद इस संयंत्र की क्षमता सालाना 4 लाख टन शुद्ध तांबे की थी, जो भारत की 40% मांग को पूरा करती थी और निर्यात में योगदान देती थी। इसके बंद होने से भारत तांबे का शुद्ध आयातक बन गया, जिससे विदेशी मुद्रा में 3.5 billion डॉलर का नुकसान हुआ। कंपनी Vedanta ने स्वच्छ तकनीक के साथ एक 'green copper' परियोजना का प्रस्ताव दिया, लेकिन उसके आवेदन को TNPCB ने खारिज कर दिया। Madras High Court ने राज्य सरकार को कानूनी और पर्यावरणीय बहसों के बीच नए प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया है।
- PM Modi ने Thoothukudi में Sterlite Copper संयंत्र के बंद होने को राष्ट्रीय हित का मामला बताया और एक साजिश का संकेत दिया।
- संयंत्र के बंद होने से भारत तांबा निर्यातक से शुद्ध आयातक बन गया, जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
- Vedanta ने उन्नत, स्वच्छ तकनीक के साथ एक 'green copper' परियोजना का प्रस्ताव दिया, लेकिन TNPCB ने इसे खारिज कर दिया।
Supreme Court ने हाल ही में एक पितृत्व विवाद में DNA tests के उपयोग को बरकरार रखा, जिसमें बच्चे के माता-पिता को जानने के अधिकार और व्यक्ति के निजता के अधिकार को संतुलित करने के जटिल प्रश्न को हल किया गया। हालांकि पिछले फैसलों ने नियमित DNA tests के खिलाफ चेतावनी दी थी, लेकिन इस फैसले ने बच्चे की स्पष्टता (closure) की इच्छा पर जोर दिया। अदालत ने 2017 के Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India मामले का उल्लेख किया, जिसने निजता को एक मौलिक अधिकार (fundamental right) के रूप में स्थापित किया था। इसने 2014 के Nandlal Wasudeo Badwaik v. Lata Nandlal Badwaik मामले का भी हवाला दिया, जिसमें पुष्टि की गई थी कि संघर्ष की स्थिति में वैज्ञानिक प्रगति को निर्णायक कानूनी सबूतों पर वरीयता मिलनी चाहिए, जैसा कि N.D. Tiwari पितृत्व मामले में देखा गया था।
- Supreme Court ने पिता की निजता के अधिकार के खिलाफ बच्चे के पितृत्व जानने के अधिकार को संतुलित करने पर फैसला सुनाया।
- अदालत ने एक विशिष्ट पितृत्व विवाद में DNA tests के उपयोग को बरकरार रखा, जो नियमित परीक्षण के खिलाफ पिछली चेतावनियों से आगे बढ़कर है।
- यह फैसला Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India मामले (2017) में स्थापित निजता के मौलिक अधिकार को स्वीकार करता है।
सुप्रीम कोर्ट AI समिति ने मसौदा नियम प्रस्तावित किए हैं जो न्यायिक परिणामों, सजा सुनाने या व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग निर्धारित करने के लिए Artificial Intelligence (AI) के उपयोग को प्रतिबंधित करते हैं। नियम अनिवार्य करते हैं कि AI प्रणालियों को केवल सहायक क्षमता में, सख्त मानवीय निर्णय के तहत काम करना चाहिए, और जाति या लिंग जैसे विभिन्न आधारों पर पूर्वाग्रहों को कायम नहीं रखना चाहिए। जबकि AI को केस मैनेजमेंट और शेड्यूलिंग जैसे प्रशासनिक कार्यों के लिए अनुमति है, "risk scoring" या गवाह की विश्वसनीयता का आकलन करने के लिए इसके उपयोग पर प्रतिबंध है। न्यायपालिका में AI को अपनाने की निगरानी के लिए एक "apex body" का प्रस्ताव किया गया है, जो पहुंच सुनिश्चित करेगा और डिजिटल विभाजन को रोकेगा।
- सुप्रीम कोर्ट के मसौदा नियम AI को न्यायिक निर्णय लेने या व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग करने से प्रतिबंधित करते हैं।
- AI प्रणालियों का उपयोग केवल सहायक उपकरणों के रूप में किया जाना है, हमेशा मानवीय पर्यवेक्षण और निर्णय के तहत।
- नियम स्पष्ट रूप से AI को संरक्षित विशेषताओं के आधार पर पूर्वाग्रहों को कायम रखने से रोकते हैं।
यह लेख "ऑपरेशन लंगड़ा" का विश्लेषण करता है, जो उत्तर प्रदेश में एक पुलिसिंग विधि है जिसमें संदिग्धों को मारने के बजाय उन्हें विकलांग करने के लिए पैर में गोली मारी जाती है। ये "हाफ-एनकाउंटर" 2017 से नियमित हो गए हैं, जिनकी विशेषता लक्षित पैर की चोट, मानकीकृत रिपोर्टिंग और आधिकारिक समर्थन है। जबकि इसे एक व्यावहारिक अपराध-नियंत्रण मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और संदिग्धों के जीवित रहने के कारण कानूनी रूप से बचाव योग्य माना जाता है, यह ड्यू प्रोसेस और कानून के शासन के बारे में चिंताएँ बढ़ाता है। यह प्रणाली राजनीतिक समर्थन, पदोन्नति जैसे पेशेवर प्रोत्साहनों और अलोचनात्मक मीडिया द्वारा संचालित होकर आत्म-निर्भर है। Supreme Court के दिशानिर्देशों (People's Union for Civil Liberties v. State of Maharashtra, 2014) के बावजूद स्वतंत्र जाँच के लिए, इन्हें व्यवस्थित रूप से लागू नहीं किया जाता है, जिससे परस्पर जुड़े प्रोत्साहनों को खत्म किए बिना मौलिक सुधार चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
- "ऑपरेशन लंगड़ा" उत्तर प्रदेश में एक नियमित पुलिसिंग अभ्यास है जिसमें संदिग्धों को विकलांग करने के लिए उनके पैर में गोली मारी जाती है।
- इस "हाफ-एनकाउंटर" विधि को कानूनी रूप से बचाव योग्य माना जाता है क्योंकि संदिग्ध जीवित रहते हैं, जिससे गिरफ्तारी संभव होती है।
- यह अभ्यास राजनीतिक समर्थन, पेशेवर प्रोत्साहनों और अलोचनात्मक मीडिया रिपोर्टिंग द्वारा कायम है।
यह लेख 'भूल जाने के अधिकार' (सूचनात्मक गोपनीयता) और खुली न्याय प्रणाली के बीच संघर्ष की पड़ताल करता है, विशेष रूप से डिजिटल अदालती अभिलेखों के संबंध में। जबकि Supreme Court ने Justice K.S. Puttaswamy (2017) मामले में निजता के अधिकार को मान्यता दी थी, Delhi High Court के एक आदेश ने डिजिटल जानकारी की निरंतरता पर प्रकाश डाला। मूल मुद्दा खोजे जाने योग्य होना नहीं बल्कि अपूर्णता है, क्योंकि अभिलेख अक्सर बाद के निर्णयों जैसे कि बरी होने को दर्शाने में विफल रहते हैं। लेख का तर्क है कि न्यायिक अभिलेख, आधिकारिक राज्य कृत्यों के रूप में, पूरी तरह से सार्वजनिक होने चाहिए, सभी प्रमुख कार्यों को दर्शाने के लिए सटीक रूप से अद्यतन किए जाने चाहिए, और प्लेटफार्मों द्वारा उचित संदर्भ के साथ प्रस्तुत किए जाने चाहिए। यह दृष्टिकोण मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है, डिजिटल सटीकता सुनिश्चित करता है, और समस्या के मूल कारण को संबोधित करता है।
- यह लेख डिजिटल अदालती अभिलेखों के संबंध में 'भूल जाने के अधिकार' और खुली न्याय प्रणाली के सिद्धांत के बीच तनाव को संबोधित करता है।
- Supreme Court ने Justice K.S. Puttaswamy (2017) मामले में सूचनात्मक निजता के अधिकार को मान्यता दी।
- प्राथमिक समस्या डिजिटल अभिलेखों की अपूर्णता है, जो अक्सर बाद के न्यायिक निर्णयों जैसे कि बरी होने को नहीं दर्शाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पाँच नए न्यायाधीशों का स्वागत किया, जिससे उसकी कार्यशील संख्या बढ़कर 37 हो गई, केवल एक पद रिक्त रह गया। ये नियुक्तियाँ केंद्र के Supreme Court (Number of Judges) Amendment Ordinance, 2026 के माध्यम से अदालत की स्वीकृत संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 न्यायाधीशों (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) करने के निर्णय के बाद हुई हैं। CJI Surya Kant ने नए नियुक्तियों को पद की शपथ दिलाई, जिनमें विभिन्न उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं। इस कदम का उद्देश्य कार्यभार को संबोधित करना और शीर्ष अदालत में समय पर न्याय वितरण सुनिश्चित करना है।
- पाँच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ सुप्रीम कोर्ट की कार्यशील संख्या बढ़कर 37 हो गई है।
- यह विस्तार केंद्र के भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर स्वीकृत संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करने के निर्णय के बाद हुआ है।
- यह वृद्धि Supreme Court (Number of Judges) Amendment Ordinance, 2026 द्वारा सुगम हुई।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है, जिससे इसकी कार्यशील संख्या 37 हो गई है, जो 38 की संशोधित स्वीकृत संख्या से थोड़ी ही कम है। ये नियुक्तियां 27 मई, 2026 को Collegium की सिफारिश के बाद हुई हैं। नए न्यायाधीशों में विभिन्न High Courts के Chief Justices और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं। यह विकास सुप्रीम कोर्ट (Number of Judges) Amendment Ordinance, 2026 के माध्यम से मई में सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 न्यायाधीश करने के बाद हुआ है। वर्तमान में, Justice B.V. Nagarathna सुप्रीम कोर्ट में एकमात्र महिला न्यायाधीश हैं।
- केंद्र ने पांच नए सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी, जिससे कार्यशील संख्या 37 हो गई।
- नियुक्तियां संविधान के Article 124(2) के तहत, Collegium की सिफारिश के बाद की गईं।
- सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत संख्या को हाल ही में मई 2026 में एक Amendment Ordinance के माध्यम से 34 से बढ़ाकर 38 न्यायाधीश कर दिया गया था।
The Supreme Court has established a close link between human trafficking and broader migration flows, describing trafficking as a severe form of exploitation arising from systemic inequalities that transform survival strategies into pathways of exploitation. Justices J.B. Pardiwala and R. Mahadevan noted that while not all migration is trafficking, the latter rarely occurs without it. The court also addressed the Immoral Traffic (Prevention) Act (ITPA), highlighting its failure to accord rights and protections to voluntary adult sex workers, which leads to social stigma and isolation. It called for the government to recognize the rights of voluntary adult sex workers and re-examine the conflation of sex trafficking and sex work in legislative frameworks.
- The Supreme Court linked human trafficking to broader migration flows, stemming from systemic inequalities.
- Trafficking is seen as an extreme form of exploitation, often emerging from survival strategies.
- The Immoral Traffic (Prevention) Act (ITPA) is criticized for failing to protect voluntary adult sex workers.
The article critiques the Supreme Court's increasing reliance on suo motu cognisance in individual criminal cases, likening it to a bureaucracy ringing its own chain. It argues that such interventions, often triggered by media reports, are "heroic" but fail to promote institutional shake-up in lower judiciary. The author points out that while the apex court takes cognisance, the actual work of conviction or investigation is done by trial courts. The trend of rising suo motu cases since 2020, contrasted with earlier periods, suggests a shift from a "rare" to a "recurring" instrument, raising questions about the effective use of scarce judicial attention, especially when dowry deaths and other serious crimes have low conviction rates.
- The Supreme Court's frequent use of suo motu cognisance in individual criminal cases is criticized as a form of judicial overreach.
- Such interventions, often media-driven, are seen as superficial rather than leading to systemic reforms in the lower judiciary.
- The article highlights that despite apex court cognisance, the investigative and conviction work primarily rests with trial courts.
Despite a modest increase in capacity, Indian prisons remain severely overcrowded, with the occupancy rate at 112.7% in 2024, a decade-low but still high. This issue is primarily driven by the disproportionately high share of undertrials, who constituted about 73% of the total inmate population in 2024. States like Delhi (194% occupancy) and Jammu & Kashmir (148%) show extreme overcrowding. A Parliamentary Committee report highlighted that overcrowding strains resources, compromises living standards, and limits access to facilities. Additionally, high staff vacancies, with almost half of sanctioned posts vacant in some states, further exacerbate the problem.
- Indian prisons are significantly overcrowded, with an occupancy rate of 112.7% in 2024.
- Undertrials account for approximately 73% of the total inmate population, contributing significantly to overcrowding.
- States like Delhi (194%) and Jammu & Kashmir (148%) exhibit severe overcrowding.
Brinda Karat critiques the Janjati Suraksha Manch (JSM) and Vanvasi Kalyan Ashram, RSS progeny, for their majoritarian agenda targeting Adivasi identity and faith. The JSM demands delisting Adivasi communities converted to Christianity from ST status, citing the Presidential Order of 1950 for Scheduled Castes. Karat argues this ignores the foundational distinction that Adivasi identity is not religion-based, as upheld by the Patna High Court in 1963. She highlights JSM's coercive tactics, such as forced exhumations and exclusion from community festivals, to prove Adivasis abandon their culture upon conversion. She also criticizes the cooption campaign asserting Adivasis as part of the "sanatan parivar" and Home Minister Amit Shah's endorsement of this agenda, while ignoring urgent issues like Forest Rights Act sabotage and corporate takeovers.
- Janjati Suraksha Manch (JSM) and Vanvasi Kalyan Ashram advocate delisting Christian Adivasis from Scheduled Tribe (ST) status.
- This demand is based on the Presidential Order of 1950 for Scheduled Castes, which links identity to religion.
- Adivasi identity is fundamentally not religion-based, as established by the Patna High Court in 1963.
The Supreme Court has issued notices to the Union Government, CBSE, and NCERT regarding the implementation of a three-language formula for Class 9 students from July 1, 2026. While declining an immediate stay, the Court acknowledged concerns about "hardship and inconvenience." The CBSE's mandate requires two of the three languages to be native Indian languages, with foreign languages only as a third or optional fourth subject. Critics argue this is a political decision, lacks parliamentary backing, and violates NEP 2020's promise of flexibility and no language imposition. Concerns include added pressure on students, teacher shortages, and textbook unavailability.
- Supreme Court issued notices to the Union Government, CBSE, and NCERT on the three-language formula for Class 9 students.
- The CBSE mandate requires two of the three languages to be native Indian languages.
- The policy is challenged on constitutional grounds, citing personal choice and lack of parliamentary legislation.
लेख का तर्क है कि सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय कानून को शक्तिशाली राज्यों द्वारा तेजी से "optional" माना जा रहा है, जिससे नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर हो रही है। यह UN Charter के बल प्रयोग पर प्रतिबंध, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सहित मूलभूत सिद्धांतों के कई उल्लंघनों पर प्रकाश डालता है, जिसमें रूस के यूक्रेन पर आक्रमण और U.S.-इजरायल के ईरान पर युद्ध का हवाला दिया गया है। UNCLOS, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, मानवाधिकार संधियों और हथियार-नियंत्रण व्यवस्थाओं के उल्लंघनों पर भी चर्चा की गई है। लेखक का तर्क है कि जिस दंडमुक्ति के साथ शक्तिशाली राज्य कार्य करते हैं, वह यह संकेत देता है कि "might is right", जिससे एक ऐसा शून्य पैदा होता है जहां शक्ति वैधता निर्धारित करती है और वैश्विक शांति और स्थिरता को खतरा होता है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून को शक्तिशाली राज्यों द्वारा तेजी से अनदेखा किया जा रहा है, जिससे नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है।
- UN Charter के बल प्रयोग पर प्रतिबंध और संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन आम होता जा रहा है।
- उदाहरणों में रूस का यूक्रेन पर आक्रमण, U.S.-इजरायल का ईरान पर युद्ध और दक्षिण चीन सागर में चीन के कार्य शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG पेपर लीक मामले पर गहरी चिंता व्यक्त की, जिसमें कड़ी मेहनत के वर्षों के बर्बाद होने के कारण छात्रों और उनके परिवारों पर हुए आघात पर प्रकाश डाला गया। अदालत ने National Testing Agency (NTA) की "ad-hocism" और "institutional memory and framework" की कमी की आलोचना की, यह सवाल उठाते हुए कि यह UPSC के विपरीत गलतियों को क्यों दोहराता है। केंद्र सरकार ने अदालत को सूचित किया कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। NTA ने कहा कि NEET-UG 2026 को रद्द करना और जांच को CBI को हस्तांतरित करना मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है, जिससे लगभग 23 लाख उम्मीदवार प्रभावित हुए हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG के उम्मीदवारों और उनके परिवारों द्वारा पेपर लीक के कारण अनुभव किए गए गंभीर भावनात्मक आघात पर प्रकाश डाला।
- अदालत ने National Testing Agency (NTA) की "ad-hocism" और "institutional memory and framework" की कमी की आलोचना की, जिससे बार-बार गलतियाँ होती हैं।
- केंद्र सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से स्थिति की निगरानी कर रहे हैं।
The Supreme Court's May 21 clarification allows trials and proceedings under Section 124A (sedition) to resume for accused persons who consent to it, partially reviving the paused colonial-era provision. This decision, made in an unconnected case (Kamran vs State of Madhya Pradesh), raises concerns about constitutional questions, particularly regarding the provision's constitutionality which is still pending before the SC in the Vombatkere petitions. Critics argue it creates disparity, forcing some accused into trials under an undecided law while others remain in limbo, and undermines the fundamental right to equality before the law. The article highlights the historical context of sedition and its potential chilling effect on free speech.
- The Supreme Court's May 21 clarification allows sedition proceedings under Section 124A to resume for accused persons who willingly consent to face trial.
- This decision partially revives a colonial-era provision whose constitutionality is still under challenge in pending petitions (Vombatkere vs Union of India).
- The clarification creates a disparity, as consenting accused face trial under an undecided law, while others can remain in indefinite limbo.