न्यायपालिका को नए नियामक निकायों के माध्यम से ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करने के बजाय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए
Supreme Court ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करने के लिए स्वतंत्र निकायों के निर्माण पर बहस कर रहा है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) का उल्लंघन कर सकता है। संविधान के Article 19(2) के तहत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था जैसे विशिष्ट आधारों पर ही प्रतिबंधित किया जा सकता है। लेख का तर्क है कि न्यायालय के पास विनियमन के लिए तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव है और उसे 'न्यायिक कानून निर्माण' (judicial lawmaking) से बचना चाहिए। यह EU के Digital Services Act जैसे अंतरराष्ट्रीय रुझानों पर प्रकाश डालता है और चेतावनी देता है कि न्यायपालिका द्वारा अत्यधिक विनियमन अनजाने में लोकतांत्रिक असहमति को दबा सकता है और लोकतंत्रों को निरंकुशता में बदल सकता है।
मुख्य बिंदु
- Article 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के लिए एकमात्र संवैधानिक आधार प्रदान करता है, और न्यायालय नई श्रेणियां नहीं जोड़ सकता है।
- ऑनलाइन मीडिया को विनियमित करने का प्रयास करते समय न्यायपालिका को तकनीकी विशेषज्ञता की कमी सहित संस्थागत बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- मीडिया की पूर्व-सेंसरशिप (Pre-censorship) से हर कीमत पर बचा जाना चाहिए, जैसा कि Sahara India Real Estate Corp. Ltd. मामले में स्थापित किया गया है।
- Kaushal Kishor (2023) के फैसले ने पुष्टि की कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर Article 19(2) के अलावा अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते।
परीक्षा तथ्य
- भारतीय संविधान का Article 19(2)
- Information Technology Act की Section 67
- Kaushal Kishor बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) मामला
- EU Digital Services Act 2022
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