दोनों देशों द्वारा लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने में असमर्थता के कारण भारत-चीन सीमा अनिश्चित बनी हुई है। राजीव गांधी की 1988 की यात्रा के बाद, यथास्थिति बनाए रखने के लिए 1993 के बॉर्डर पीस एंड ट्रanquिलिटी एग्रीमेंट (BPTA) पर हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, नक्शों के आदान-प्रदान और LAC को स्पष्ट करने के बाद के प्रयास, विशेष रूप से 2000 के दशक की शुरुआत में, विफल रहे क्योंकि दोनों पक्षों ने अधिकतमवादी रुख पेश किया। पारस्परिक रूप से सहमत सीमा की कमी के कारण बार-बार आमना-सामना हुआ है, विशेष रूप से 2020 में पूर्वी लद्दाख में। लेख इस बात पर जोर देता है कि परिभाषित LAC के बिना शांति नाजुक बनी हुई है।
- 1993 का बॉर्डर पीस एंड ट्रanquिलिटी एग्रीमेंट (BPTA) LAC पर शांति बनाए रखने के लिए पहला औपचारिक समझौता था।
- 1996 के समझौते ने BPTA का विस्तार किया, जिसमें तनाव को रोकने के लिए सैन्य विश्वास-निर्माण उपायों (CBMs) पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- 2000-2002 में नक्शों के आदान-प्रदान के माध्यम से LAC को स्पष्ट करने के प्रयास पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में विरोधाभासी क्षेत्रीय दावों के कारण रुक गए।
निर्जन द्वीप Katchatheevu भारत-श्रीलंका संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। हाल ही में, श्रीलंकाई राष्ट्रपति Anura Kumara Dissanayake ने द्वीप का दौरा किया, जो किसी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा ऐसा पहला दौरा था, जिसने भारत में राजनीतिक बहस को फिर से शुरू कर दिया है। भारत ने 1974 और 1976 में समुद्री सीमा समझौतों के माध्यम से द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया था। हालाँकि, तमिलनाडु के राजनेता अक्सर भारतीय मछुआरों के मछली पकड़ने के अधिकारों की रक्षा के लिए इसे वापस लेने की मांग करते हैं, जिन्हें अक्सर International Maritime Boundary Line (IMBL) पार करने के लिए श्रीलंकाई नौसेना द्वारा गिरफ्तार किया जाता है। यह मुद्दा bottom-trawling की प्रथा से जटिल हो गया है, जो श्रीलंका में प्रतिबंधित है।
- Katchatheevu को 1974 और 1976 के समुद्री सीमा समझौतों के तहत श्रीलंका के क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई थी।
- यह द्वीप St. Anthony's Shrine का घर है, जहाँ भारतीय तीर्थयात्रियों को वार्षिक उत्सव के लिए बिना वीजा के जाने की अनुमति है।
- विवाद पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में भारतीय मछुआरों के पारंपरिक मछली पकड़ने के अधिकारों पर केंद्रित है।
तियानजिन में Shanghai Cooperation Organisation (SCO) शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री Narendra Modi की भागीदारी भारत के रणनीतिक संतुलन को रेखांकित करती है। शिखर सम्मेलन में भारत, चीन और रूस के बीच उच्च स्तरीय बैठकें हुईं, जो गलवान झड़पों के बाद नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संबंधों के संभावित सामान्यीकरण का संकेत देती हैं। हालाँकि, 'ट्रोइका' (रूस, चीन, भारत) के साथ भारत के जुड़ाव ने अमेरिका की जांच को आकर्षित किया है, विशेष रूप से टैरिफ और प्रतिबंधों के संबंध में। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) की नीति को बनाए रखना जारी रखता है, एक बहुध्रुवीय दुनिया में अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए पूर्व (SCO, BRICS) और पश्चिम दोनों के साथ जुड़ रहा है।
- तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन ने 2018 के बाद से मोदी और Xi Jinping के बीच पहली द्विपक्षीय बैठक के लिए एक मंच प्रदान किया।
- भारत और चीन संबंधों को सामान्य बनाने और विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से सीमा मुद्दों को हल करने पर सहमत हुए।
- भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ (50% तक) और रूसी तेल पर प्रतिबंध भारत-अमेरिका संबंधों में प्रमुख घर्षण बिंदु बने हुए हैं।
प्रधानमंत्री Narendra Modi न्यूयॉर्क में United Nations General Assembly (UNGA) के 80वें सत्र में शामिल नहीं होंगे। इसके बजाय, विदेश मंत्री S. Jaishankar 27 सितंबर को General Debate को संबोधित करेंगे। इस सत्र का विषय 'Better together: 80 years and more for peace, development, human rights' है। हालाँकि प्रधानमंत्री UNGA में शामिल नहीं हो रहे हैं, लेकिन उन्होंने हाल ही में यूक्रेन संघर्ष और भारत-फ्रांस रणनीतिक संबंधों पर चर्चा करने के लिए फ्रांसीसी राष्ट्रपति Emmanuel Macron के साथ फोन पर बातचीत की। UNGA सत्र चल रहे वैश्विक संघर्षों, जिसमें इजरायल-हमास युद्ध और रूस-यूक्रेन संकट शामिल हैं, के बीच हो रहा है, जिसके लिए उच्च स्तरीय राजनयिक जुड़ाव की आवश्यकता है।
- 80वां UNGA सत्र 9 सितंबर को खुलेगा, जिसमें General Debate 23-29 सितंबर के लिए निर्धारित है।
- परंपरागत रूप से ब्राजील सत्र के पहले वक्ता के रूप में कार्य करता है, उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका का नंबर आता है।
- 80वें सत्र का विषय पिछले आठ दशकों में शांति, विकास और मानवाधिकारों पर केंद्रित है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ब्राजील के राष्ट्रपति Lula da Silva द्वारा बुलाए गए एक वर्चुअल BRICS शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। बैठक का उद्देश्य BRICS सदस्यों सहित कई देशों पर U.S. द्वारा लगाए गए एकतरफा टैरिफ के वैश्विक व्यापार प्रभाव को संबोधित करना है। जबकि भारत और ब्राजील को उच्च टैरिफ (50% तक) का सामना करना पड़ता है, चीन और दक्षिण अफ्रीका को 30% का सामना करना पड़ता है। शिखर सम्मेलन इन आर्थिक उपायों का मुकाबला करने और बहुपक्षवाद को मजबूत करने के लिए एक 'साझा योजना' बनाने का प्रयास करता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत BRICS समूह की अध्यक्षता संभालने और अगले शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है।
- यह शिखर सम्मेलन विभिन्न BRICS देशों पर 10% से 50% तक के U.S. द्वारा लगाए गए टैरिफ की प्रतिक्रिया है।
- BRICS का विस्तार मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे नए सदस्यों को शामिल करने के लिए किया गया है।
- बैठक एकतरफा आर्थिक उपायों का मुकाबला करने और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
शशि थरूर भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) का पता लगाते हैं, जो एक खंडित दुनिया में गुटनिरपेक्षता से 'बहु-संरेखण' (multi-alignment) की ओर विकसित हो रही है। यह रणनीतिक स्वायत्तता को बाहरी बाधाओं के बिना संप्रभु विदेश नीति और रक्षा निर्णय लेने की क्षमता के रूप में परिभाषित करता है। भारत को अमेरिका, चीन और रूस के बीच एक नाजुक संतुलन का सामना करना पड़ रहा है। जबकि Quad और iCET के माध्यम से अमेरिका के साथ संबंध परिपक्व हुए हैं, भारत यूक्रेन संघर्ष के बावजूद रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध बनाए रखता है। लेख इस बात पर जोर देता है कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक सुसंगतता की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारत 'पश्चिम-विरोधी' (anti-West) के बजाय 'गैर-पश्चिम' (non-West) शक्ति बना रहे।
- रणनीतिक स्वायत्तता भारत को कठोर गुटों में शामिल होने के बजाय अपनी शर्तों पर कई शक्तियों के साथ जुड़ने की अनुमति देती है।
- Quad, i2U2 और India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) जैसी पहलों के माध्यम से अमेरिका के साथ भारत के संबंध परिपक्व हुए हैं।
- पश्चिमी दबाव के बावजूद, भारत रक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस के साथ अपनी ऐतिहासिक और रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है।
उच्च ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में फैली भारत-चीन सीमा काफी हद तक अनिश्चित बनी हुई है और लंबे समय से घर्षण का स्रोत रही है। ऐतिहासिक रूप से, 1914 में परिभाषित McMahon Line को चीन ने खारिज कर दिया था, जिससे 1962 का युद्ध हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव गांधी जैसे नेताओं की विभिन्न राजनयिक पहलों के बावजूद, अंतिम समाधान अभी भी दूर है। सीमा को क्षेत्रों (sectors) में विभाजित किया गया है, जिसमें Aksai Chin और Arunachal Pradesh क्षेत्र विवाद के प्राथमिक बिंदु हैं। वर्तमान में, दोनों राष्ट्र विशेष कार्य समूहों और राजनयिक संवाद के माध्यम से Line of Actual Control (LAC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- McMahon Line 1914 के Simla Convention के दौरान स्थापित की गई थी, लेकिन चीनी सरकार द्वारा इसे कभी भी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।
- 1962 का भारत-चीन युद्ध Aksai Chin और North-East Frontier Agency में विफल वार्ताओं और क्षेत्रीय दावों का परिणाम था।
- 1980 के दशक में राजनयिक प्रयासों के कारण LAC पर शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त कार्य समूहों का गठन हुआ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 9 जनवरी, 2015 से पहले भारत में प्रवेश करने वाले श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को Passport and Foreigners Acts के तहत दंडात्मक प्रावधानों से छूट देने का आदेश जारी किया है। इसका मतलब है कि वैध दस्तावेजों के बिना रहने वालों को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा या उन्हें जुर्माने और कारावास का सामना नहीं करना पड़ेगा। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह छूट Citizenship (Amendment) Act (CAA) से अलग है और यह स्वचालित रूप से CAA की कट-ऑफ तारीख को नहीं बढ़ाती है। इस कदम को दीर्घकालिक शरणार्थियों को राहत प्रदान करने की दिशा में एक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जबकि नागरिकता के लिए मानक प्राकृतिककरण प्रक्रिया को बनाए रखा गया है, जिसके लिए 11 साल के निवास की आवश्यकता होती है।
- 9 जनवरी, 2015 से पहले प्रवेश करने वाले शरणार्थियों को वैध यात्रा दस्तावेजों या वीजा की कमी के लिए अभियोजन से छूट दी गई है।
- यह छूट उन लोगों पर लागू होती है जो भारत में रहने का विकल्प चुनते हैं या स्वेच्छा से श्रीलंका लौटते हैं।
- यह आदेश CAA 2019 से अलग है, जिसकी कट-ऑफ तारीख और लक्षित समूह अलग है।
Belem, Brazil में आयोजित होने वाला आगामी UN जलवायु शिखर सम्मेलन, COP-30, नए 'ग्रंथों' (texts) पर बातचीत करने के बजाय मौजूदा समझौतों के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करेगा। COP-30 के अध्यक्ष André Corrêa do Lago ने जलवायु कार्यों के वास्तविक 'निष्पादन' से वार्ताओं को अलग करने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह शिखर सम्मेलन एक महत्वपूर्ण समय पर हो रहा है क्योंकि वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि वर्तमान वैश्विक प्रतिबद्धताएं तापमान में 2.6°C से अधिक की वृद्धि का कारण बनेंगी, जो Paris Agreement के 1.5°C के लक्ष्य से कहीं अधिक है। शिखर सम्मेलन Paris Agreement से U.S. की वापसी और वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से उत्पन्न चुनौतियों का भी समाधान करेगा।
- COP-30 ब्राजील के बंदरगाह शहर Belem में आयोजित किया जाएगा, जो Amazonian वर्षावन का प्रवेश द्वार है।
- Paris Agreement (COP-21) का लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे, अधिमानतः 1.5°C तक रखना है।
- शिखर सम्मेलन का उद्देश्य 'बड़ी घोषणाओं' से आगे बढ़कर व्यावहारिक, ज्ञात समाधानों की ओर बढ़ना है।
Prime Minister Modi की SCO Summit के लिए China की यात्रा भारत की foreign policy में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। 2020 के सैन्य गतिरोध के बाद President Xi Jinping के साथ यह पहली द्विपक्षीय बातचीत थी। बैठक ने अक्टूबर 2024 में शुरू की गई सामान्यीकरण प्रक्रिया को मंजूरी दी, जिसमें LAC के साथ सैनिकों की वापसी और सीमा समाधान पर ध्यान केंद्रित किया गया। शिखर सम्मेलन में जारी 'Tianjin declaration' में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सख्त भाषा शामिल थी। SCO के साथ जुड़ते हुए, भारत ने China की Belt and Road Initiative का अपना विरोध जारी रखा, लेकिन Gaza जैसे मुद्दों पर समान आधार पाया।
- शिखर सम्मेलन ने भारत और China के बीच सीधी उड़ानों की बहाली, वीजा सुविधा और आर्थिक संबंधों को सुगम बनाया।
- भारत ने यूरेशियाई समूह के भीतर संबंधों को संतुलित करते हुए सीमा पार आतंकवाद की निंदा करने के लिए मंच का उपयोग किया।
- PM Modi ने 'SCO Plus' शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया, इसके बजाय द्विपक्षीय और मुख्य SCO व्यस्तताओं पर ध्यान केंद्रित किया।
Tianjin में आयोजित 10-सदस्यीय Shanghai Cooperation Organisation (SCO) शिखर सम्मेलन में Tianjin Declaration को अपनाया गया, जिसमें आतंकवाद और सीमा पार गतिविधियों की कड़ी निंदा की गई। भारत, चीन और रूस सहित सदस्य देशों ने एकतरफा दमनकारी उपायों का विरोध करते हुए अलगाववाद और उग्रवाद से लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। भारत ईरान के खिलाफ हमलों की निंदा करने में शामिल हुआ, लेकिन चीन की Belt and Road Initiative (BRI) के लिए समर्थन नहीं दोहराने वाला एकमात्र सदस्य रहा। PM Modi ने टेरर फाइनेंसिंग के खिलाफ समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर प्रकाश डाला और Chabahar Port और International North-South Transport Corridor (INSTC) जैसी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया।
- Tianjin Declaration पर सभी 10 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए, जिसमें आतंकवादियों की सीमा पार गतिविधियों को समाप्त करने का आह्वान किया गया।
- सदस्य देशों ने गाजा में मानवीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की और फिलिस्तीनी मुद्दे के न्यायपूर्ण समाधान का आह्वान किया।
- भारत ने Chabahar Port और International North-South Transport Corridor (INSTC) के माध्यम से कनेक्टिविटी में अपनी भूमिका पर प्रकाश डाला।
प्रधानमंत्री Modi ने PM Shigeru Ishiba के साथ 15वें वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए जापान का दौरा किया, जो 'Next-Gen' साझेदारी पर केंद्रित था। दोनों देशों ने अपनी 2008 Security Partnership को अपडेट किया, जिसमें वार्षिक NSA-स्तरीय संवाद और Quad तथा Indo-Pacific सहयोग पर जुड़ाव बढ़ाना शामिल है। लचीली आपूर्ति श्रृंखला (resilient supply chains) बनाने और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से semiconductor technology को सुरक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण Economic Security Partnership स्थापित की गई थी। इस कदम का उद्देश्य दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट (rare earth magnets) पर चीनी प्रतिबंधों से जोखिमों को कम करना है। नेताओं ने High-Speed Rail परियोजना की भी समीक्षा की और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम और सीमा पार आतंकवाद की निंदा करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया।
- 15वें वार्षिक शिखर सम्मेलन के परिणामस्वरूप 2035 Vision Statement जारी किया गया, जिसमें हरित प्रौद्योगिकी (green technology) सहित सहयोग के आठ क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
- सुरक्षा सहयोग का विस्तार UN Security Council सुधार और गहरे Quad जुड़ाव को शामिल करने के लिए किया गया था।
- भारत में semiconductor technology के निर्माण और प्रसंस्करण के लिए जापानी तकनीक का उपयोग करने का एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
प्रधानमंत्री Narendra Modi और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping ने Tianjin में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की, जो चार साल के गतिरोध के बाद संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि सीमा मुद्दों को समग्र द्विपक्षीय संबंधों को परिभाषित नहीं करना चाहिए और एक निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की। Modi ने इस बात पर प्रकाश डाला कि दोनों देश आतंकवाद के शिकार हैं और इस खतरे से निपटने में आपसी सहयोग का आह्वान किया, विशेष रूप से सीमा पार आतंकवाद (cross-border terrorism) का उल्लेख किया। चर्चा में व्यापार घाटे को कम करने, सीधी उड़ानों के माध्यम से लोगों के बीच संबंधों को बढ़ाने और Kailash Mansarovar Yatra को फिर से शुरू करने पर भी चर्चा हुई।
- यह बैठक चीन के Tianjin में Shanghai Cooperation Organisation (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई।
- दोनों नेता द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों जैसे निष्पक्ष व्यापार और रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) पर साझा आधार का विस्तार करने के लिए सहमत हुए।
- भारत ने द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता के महत्व पर जोर दिया।
नेपाल के प्रधानमंत्री K.P. Sharma Oli ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने के हालिया भारत-चीन समझौते पर "कड़ी आपत्ति" व्यक्त की, जिसे काठमांडू अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। SCO शिखर सम्मेलन से पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक बैठक के दौरान, श्री ओली ने नेपाल की स्थिति को दोहराया, जिसमें 1816 Treaty of Sugauli का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल का है। विदेश सचिव अमृत बहादुर राय ने भी नेपाल का रुख व्यक्त किया। नेपाल ने पहले भी आपत्ति जताई थी जब भारत और चीन ने चीनी विदेश मंत्री Wang Yi की यात्रा के दौरान 18 अगस्त को शुरू में इस समझौते पर पहुंचे थे।
- नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने के भारत-चीन समझौते पर आपत्ति जताई।
- नेपाल 1816 Treaty of Sugauli के आधार पर लिपुलेख दर्रे को अपना संप्रभु क्षेत्र बताता है।
- नेपाली PM K.P. Sharma Oli ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को यह आपत्ति व्यक्त की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जापानी समकक्ष शिगेरू इशिबा के साथ जापान के सेंडाई में एक सेमीकंडक्टर प्लांट का दौरा किया, जब नई दिल्ली और टोक्यो ने महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने पर सहमति व्यक्त की। इस यात्रा ने भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र और जापान की शक्तियों के बीच पूरकता पर प्रकाश डाला। दोनों नेताओं ने सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में सहयोग को गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। PM मोदी ने 16 जापानी प्रान्तों के राज्यपालों से भी मुलाकात की, जिसमें India-Japan Special Strategic and Global Partnership के तहत मजबूत राज्य-प्रान्त सहयोग की वकालत की गई, जिसमें विनिर्माण, गतिशीलता, नवाचार और स्टार्ट-अप में सहयोग पर जोर दिया गया।
- PM मोदी ने अपने जापानी समकक्ष शिगेरू इशिबा के साथ जापान के सेंडाई में एक सेमीकंडक्टर प्लांट का दौरा किया।
- यह यात्रा महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी क्षेत्र और आपूर्ति श्रृंखला में सहयोग को गहरा करने के लिए भारत और जापान की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।
- PM मोदी ने जापानी राज्यपालों और भारतीय राज्य सरकारों से विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने का आग्रह किया।
इस वर्ष SCO की अध्यक्षता कर रहा चीन कहता है कि Tianjin Declaration बहुपक्षवाद और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देगा। भारत शिखर सम्मेलन में आतंकवाद विरोधी प्रयासों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए मजबूत प्रतिबद्धताओं को सुरक्षित करने का लक्ष्य रखता है। भारत ने पहले जून में SCO रक्षा मंत्रियों की बैठक में एक संयुक्त बयान का समर्थन करने से इनकार कर दिया था, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ कड़ी भाषा की वकालत की गई थी। विदेश मंत्री S. Jaishankar ने भी SCO से आतंकवाद पर कोई समझौता न करने का आग्रह किया था। PM मोदी सोमवार को रवाना होंगे, जबकि अन्य नेता WWII में जापानी आक्रमण के खिलाफ चीन की जीत का जश्न मनाने वाली सैन्य परेड के लिए रुक सकते हैं।
- चीन की SCO अध्यक्षता के तहत Tianjin Declaration बहुपक्षवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करेगा।
- भारत SCO शिखर सम्मेलन में आतंकवाद विरोधी और क्षेत्रीय स्थिरता पर मजबूत प्रतिबद्धताएं चाहता है।
- भारत ने पहले SCO रक्षा मंत्रियों की बैठक में एक संयुक्त बयान का समर्थन करने से इनकार कर दिया था, जिसमें कड़ी आतंकवाद विरोधी भाषा की मांग की गई थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन से पहले 2018 के बाद अपनी पहली यात्रा के लिए चीन के तियानजिन पहुंचे। वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठकें करने वाले हैं। यह यात्रा U.S. टैरिफ युद्धों के बीच भारत-चीन संबंधों में सुधार का संकेत देती है। यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने मोदी को फोन कर SCO शिखर सम्मेलन में "तत्काल युद्धविराम" के लिए "उचित संकेत" देने का आग्रह किया। U.S. आयात शुल्क, जिसमें भारतीय वस्तुओं पर 50% शुल्क शामिल है, के कारण वैश्विक व्यापार अशांति को देखते हुए SCO बैठक महत्वपूर्ण है।
- SCO शिखर सम्मेलन के लिए PM मोदी की चीन यात्रा 2018 के बाद उनकी पहली यात्रा है, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है।
- वह अन्य नेताओं के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने वाले हैं।
- यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने PM मोदी से SCO शिखर सम्मेलन में "तत्काल युद्धविराम" की वकालत करने का आग्रह किया।
भारत के पर्यावरण मंत्रालय और जापान ने निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक Joint Crediting Mechanism (JCM) पर एक Memorandum of Cooperation (MoC) पर हस्ताक्षर किए हैं। JCM के तहत, जापान भारत जैसे विकासशील देशों में निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों में निवेश करता है, जिससे उसे अपने राष्ट्रीय उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों के लिए कार्बन क्रेडिट मिलते हैं। इस पहल का उद्देश्य भारत में निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों में निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्थानीयकरण को बढ़ावा देना है, जिससे एक घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिले। MoC Paris Agreement के Article 6.2 के तहत कार्बन क्रेडिट के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को भी सुविधाजनक बनाएगा, जो 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता को कम करने और गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता बढ़ाने के लिए भारत की Nationally Determined Contribution (NDC) प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
- भारत और जापान ने एक Joint Crediting Mechanism (JCM) पर एक Memorandum of Cooperation (MoC) पर हस्ताक्षर किए।
- JCM जापान को भारत में निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों में निवेश करने और अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों के लिए कार्बन क्रेडिट प्राप्त करने की अनुमति देता है।
- इस पहल का उद्देश्य भारत में निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों में निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्थानीयकरण को बढ़ावा देना है।
भारत, जो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर अत्यधिक निर्भर है, वैश्विक अस्थिरता के बीच महत्वपूर्ण ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों का सामना करता है। यह लेख ऐतिहासिक ऊर्जा झटकों पर प्रकाश डालता है और घरेलू क्षमता, विविध प्रौद्योगिकी और लचीली प्रणालियों पर आधारित ऊर्जा संप्रभुता के सिद्धांत का प्रस्ताव करता है। पांच मूलभूत स्तंभों को रेखांकित किया गया है: स्वदेशी ऊर्जा के लिए Coal Gasification, ग्रामीण सशक्तिकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए Biofuels, शून्य-कार्बन बेसलोड के रूप में Nuclear Power, आत्मनिर्भरता के लिए Green Hydrogen, और ग्रिड संतुलन के लिए Pumped Hydro Storage। इस रणनीति का उद्देश्य एक निर्बाध, किफायती और स्वदेशी ऊर्जा भविष्य का निर्माण करना है, जिससे भू-राजनीतिक बदलावों और बाहरी निर्भरताओं के प्रति भेद्यता कम हो सके।
- आयातित कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर भारत की अत्यधिक निर्भरता एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जोखिम पैदा करती है।
- वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को पांच प्रमुख ऐतिहासिक झटकों ने नया रूप दिया है, जो लचीलेपन की आवश्यकता पर जोर देता है।
- भारत को घरेलू क्षमता, विविध प्रौद्योगिकी और लचीली प्रणालियों पर आधारित ऊर्जा संप्रभुता के सिद्धांत को अपनाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टोक्यो में India-Japan Economic Forum को संबोधित करते हुए कहा कि भारत 'बहुत जल्द' दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है। U.S. के साथ व्यापार अनिश्चितताओं के बीच, मोदी ने भारत में निवेश बढ़ाने की वकालत की, इसे Global South के लिए एक 'स्प्रिंगबोर्ड' के रूप में उजागर किया। जापान ने अगले दशक में भारत के लिए ¥10 ट्रिलियन निजी निवेश लक्ष्य की घोषणा की। दोनों देशों ने India-Japan AI Initiative और Economic Security Initiative जैसी पहल भी शुरू की, साथ ही हरित ऊर्जा के लिए एक Joint Credit Mechanism भी, जिससे महत्वपूर्ण क्षेत्रों और खनिज संसाधनों में सहयोग मजबूत हुआ।
- प्रधानमंत्री मोदी ने टोक्यो यात्रा के दौरान घोषणा की कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
- जापान ने अगले दशक में भारत के लिए ¥10 ट्रिलियन के निजी निवेश लक्ष्य की प्रतिबद्धता जताई।
- भारत और जापान ने आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन को मजबूत करने के लिए एक AI Initiative और एक Economic Security Initiative शुरू की।
अमेरिका ने 29 अगस्त से प्रभावी, कम मूल्य के सामानों ( $800 सीमा से कम) के शुल्क-मुक्त आयात को समाप्त कर दिया है, जिससे दुनिया भर में लॉजिस्टिक्स में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है। यह उलटफेर, जिसे शुरू में मई में चीनी आयातों पर लागू किया गया था, का उद्देश्य अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करना, बौद्धिक संपदा की चोरी को रोकना और नकली उत्पादों को अवरुद्ध करना है। विरोधियों का तर्क है कि यह कुल कल्याण को $11-$13 बिलियन तक कम कर देगा और गरीबों को असंगत रूप से नुकसान पहुंचाएगा। de minimis विनियमन, 1930 Tariff Act में निहित, को 2016 में विस्तारित किया गया था। यह कदम पिछली कार्रवाइयों के अनुरूप है, जैसे विकासशील देशों के लिए डाक दरों को बढ़ाने के लिए Universal Postal Union (UPU) के साथ ट्रंप का 2019 का सौदा। यूरोपीय संघ में भी इसी तरह के सुधार हुए हैं, जिसमें अवैध सामानों पर नकेल कसने और उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए सीधे आयात के लिए हैंडलिंग शुल्क का प्रस्ताव है।
- अमेरिका ने 29 अगस्त से प्रभावी, व्यापार घाटे को दूर करने और IP चोरी को रोकने के लिए कम मूल्य के सामानों ( $800 सीमा से कम) के शुल्क-मुक्त आयात को समाप्त कर दिया है।
- यह नीतिगत उलटफेर, जिसने शुरू में चीनी आयातों को लक्षित किया था, से वैश्विक लॉजिस्टिक्स में व्यवधान और ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों पर प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।
- आलोचकों का तर्क है कि de minimis छूट का उन्मूलन समग्र कल्याण को कम करेगा और निम्न-आय वर्ग के उपभोक्ताओं को असंगत रूप से प्रभावित करेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जापानी समकक्ष शिगेरू इशिबा से मिलने जापान जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य आर्थिक और निवेश संबंधों का विस्तार करना और AI और सेमीकंडक्टर जैसी नई प्रौद्योगिकियों में सहयोग को आगे बढ़ाना है। इस यात्रा में 15वां वार्षिक शिखर सम्मेलन शामिल है, जहां वे रक्षा हार्डवेयर खरीद और एक 'आर्थिक सुरक्षा' पहल सहित 2008 Declaration on Security Cooperation को उन्नत करने की उम्मीद है। चर्चा में Quad शिखर सम्मेलन के लिए भारत-जापान इंडो-पैसिफिक योजनाएं और B2B समझौते भी शामिल होंगे। एक प्रमुख आकर्षण सेंडाई तक बुलेट ट्रेन की सवारी और एक सेमीकंडक्टर फैक्ट्री का निरीक्षण है, जिसमें मुंबई-अहमदाबाद शिंकानसेन परियोजना के अगले चरणों पर चर्चा की जाएगी, जिसे जापान वित्त पोषित कर रहा है।
- प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा का उद्देश्य AI और सेमीकंडक्टर सहित आर्थिक, निवेश और तकनीकी सहयोग को मजबूत करना है।
- 15वां वार्षिक शिखर सम्मेलन 2008 Declaration on Security Cooperation को उन्नत करेगा और एक 'आर्थिक सुरक्षा' पहल शुरू करेगा।
- चर्चा में Quad शिखर सम्मेलन के लिए इंडो-पैसिफिक योजनाएं और कई बिजनेस-टू-बिजनेस समझौते शामिल होंगे।
U.S. भारतीय आयात पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लागू कर रहा है, जिसमें रूस से भारत के तेल आयात के लिए 25% का अतिरिक्त जुर्माना भी शामिल है, जिससे कुल टैरिफ 50% हो गया है। इस उपाय से $47-48 बिलियन मूल्य के भारतीय निर्यात पर गंभीर प्रभाव पड़ने का अनुमान है, जिससे वे अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। परिधान, वस्त्र, रत्न, झींगा, कालीन और फर्नीचर जैसे प्रमुख क्षेत्रों में महत्वपूर्ण गिरावट आने की उम्मीद है। भारत सरकार इन टैरिफ को "अनुचित" मानती है और निर्यात पर निर्भरता कम करने के लिए "स्वदेशी मंत्र" को बढ़ावा दे रही है, जबकि चीन भी U.S. टैरिफ का विरोध करता है।
- U.S. भारतीय आयात पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा रहा है, साथ ही रूसी तेल आयात के लिए 25% का जुर्माना भी, जिससे कुल टैरिफ 50% हो गया है।
- इन टैरिफ से $47 बिलियन से अधिक मूल्य के भारतीय सामान प्रभावित होने का अनुमान है, जिससे वे U.S. बाजार में अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।
- परिधान, वस्त्र, रत्न और फर्नीचर जैसे श्रम-गहन क्षेत्र विशेष रूप से कमजोर हैं, जिनमें निर्यात में 70% तक की गिरावट आ सकती है।
भारत और फिजी ने रक्षा संबंधों को गहरा करने पर सहमति व्यक्त की है, जिसमें भारत ने फिजी की maritime security को उन्नत करने के लिए प्रशिक्षण और उपकरण प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फिजी के प्रधानमंत्री Sitiveni Rabuka के बीच एक बैठक के दौरान, दोनों नेताओं ने "free, open" Indo-Pacific क्षेत्र के लिए दृढ़ समर्थन व्यक्त किया। भारत फिजी के सशस्त्र बलों के लिए क्षमता निर्माण भी करेगा और सुवा में अपने High Commission में एक defence wing खोलेगा। दोनों देशों ने सात MoUs पर हस्ताक्षर किए, जिसमें फिजी में एक super-specialty hospital और एक migration पर शामिल है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ, UN peacekeeping, military medicine, cybersecurity और humanitarian assistance में सहयोग मजबूत करने पर भी सहमति व्यक्त की, जिसमें फिजी ने maritime cooperation बढ़ाने के लिए एक भारतीय नौसेना जहाज के port call का स्वागत किया।
- भारत और फिजी ने रक्षा सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें भारत फिजी की maritime security के लिए प्रशिक्षण और उपकरण प्रदान करेगा।
- दोनों प्रधानमंत्रियों ने "free, open Indo-Pacific region" के लिए दृढ़ समर्थन दोहराया, एक ऐसा रुख जो चीन को संकेत देता है।
- भारत फिजी की राजधानी सुवा में अपने High Commission में एक defence wing स्थापित करेगा और फिजी के सैन्य बलों के लिए क्षमता निर्माण बढ़ाएगा।