सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित याचिकाकर्ताओं के एक समूह द्वारा भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती दिए जाने के बाद वह हर पहलू की जांच करेगा। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रक्रिया मनमानी है और इससे वास्तविक मतदाताओं के बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने की संभावना है, जिसमें पारदर्शिता संबंधी चिंताओं, हाशिए के वर्गों पर प्रभाव और मनमाने ढंग से नाम हटाने के मुद्दों को उजागर किया गया है। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन ज्यों की बेंच ने ECI द्वारा अपना जवाब दाखिल करने के बाद मामले को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
सुप्रीम कोर्ट बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चल रही पुनरीक्षण प्रक्रिया मनमानी है और इससे वास्तविक मतदाताओं के बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने की संभावना है।
ECI का मानना है कि नागरिक विवरणों की क्रॉस-चेकिंग करके मतदाता सूचियों को सत्यापित और अपडेट करने के लिए SIR एक नियमित प्रक्रिया है।
परीक्षा बिंदु
इस मामले की सुनवाई भारत के चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन ज्यों की बेंच कर रही है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा आयोजित किया जाता है।
यह याचिका आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और लोकतांत्रिक भागीदारी से संबंधित चिंताएं उठाती है।
शोधकर्ताओं ने मानव जीनोम को समझने में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए यह खुलासा किया है कि नॉन-कोडिंग DNA का एक बड़ा हिस्सा, जिसे पहले कबाड़ (junk) माना जाता था, जीन को विनियमित करने, लक्षणों को आकार देने और बीमारी के जोखिम को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन उन्नत जीनोमिक उपकरणों का उपयोग करके नॉन-कोडिंग DNA का विश्लेषण करता है और उन नियामक तत्वों पर ध्यान केंद्रित करता है जो स्विच के रूप में कार्य करते हैं कि जीन कब, कहाँ और कैसे व्यक्त होते हैं। यह शोध मानव जीव विज्ञान, विकास और बीमारी के हमारी समझ को नए सिरे से परिभाषित करता है, जिससे व्यक्तिगत चिकित्सा (personalized medicine) और लक्षित उपचारों के लिए नए रास्ते खुलते हैं।
नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि नॉन-कोडिंग DNA जीन विनियमन और मानव स्वास्थ्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नॉन-कोडिंग DNA नियामक स्विच के रूप में कार्य करता है जो नियंत्रित करता है कि जीन कब और कहाँ व्यक्त होते हैं।
यह खोज लंबे समय से चली आ रही उस धारणा को चुनौती देती है कि जीनोम का केवल लगभग 1-2 प्रतिशत हिस्सा ही प्रोटीन को कोड करता है।
परीक्षा बिंदु
नॉन-कोडिंग DNA पर केंद्रित यह अध्ययन नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
पारंपरिक रूप से जीनोम का केवल लगभग 1-2% हिस्सा प्रोटीन को कोड करता है, जबकि विशाल क्षेत्रों में नॉन-कोडिंग DNA शामिल होता है।
इस शोध में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और उन्नत जीनोमिक उपकरण शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक हालिया रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दुनिया के अगले कुछ वर्षों के भीतर 1.5°C वार्मिंग सीमा को पार करने की संभावना है, जो तेज डीकार्बोनाइजेशन, मजबूत बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा में बढ़े हुए निवेश की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती है। नीति आयोग (NITI Aayog) का अनुमान है कि 2070 तक भारत का 86% बिल्डिंग स्टॉक बनकर तैयार हो जाएगा, जो चरम मौसम से निपटने के लिए हरित निर्माण (green construction) की अनिवार्यता को रेखांकित करता है। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि यदि पर्याप्त अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वित्तीय सहायता उपलब्ध हो, तो भारत का ग्रीन ट्रांजिशिन विकासशील देशों के लिए एक मॉडल के रूप में काम कर सकता है।
UNEP रिपोर्ट चेतावनी देती है कि ग्लोबल वार्मिंग के जल्द ही 1.5°C की सीमा को पार करने की संभावना है, जिसके लिए तीव्र डीकार्बोनाइजेशन की आवश्यकता है।
नीति आयोग (NITI Aayog) का अनुमान है कि 2070 तक भारत का 86% बिल्डिंग स्टॉक स्थापित हो जाएगा, जिसके लिए टिकाऊ शहरी योजना और हरित निर्माण की आवश्यकता है।
भारत के कृषि, जल संसाधन और तटीय क्षेत्र अत्यधिक मौसम की घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
परीक्षा बिंदु
यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा प्रकाशित की गई थी।
नीति आयोग (NITI Aayog) का अनुमान है कि 2070 तक भारत का 86% बिल्डिंग स्टॉक तैयार हो जाएगा।
रिपोर्ट में जिस वार्मिंग सीमा पर प्रकाश डाला गया है, वह 1.5°C है।
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