SC ने राज्यों को वृद्ध, असाध्य बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए समान नीति बनाने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर वृद्ध और असाध्य बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए एक समान नीति तैयार करने और अधिसूचित करने का निर्देश दिया है। इस नीति का उद्देश्य मानवीय और समयबद्ध तरीके से दयालुता के आधार पर छूट या शीघ्र रिहाई प्रदान करना और जेलों में भीड़भाड़ को कम करने में मदद करना है। न्यायालय ने अनिवार्य किया कि राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों के परामर्श से तैयार की गई नीति में 'असाध्य बीमारी' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए और पात्रता मानदंड और प्रक्रियात्मक ढांचे स्थापित किए जाने चाहिए। इसने स्वतंत्र चिकित्सा बोर्डों के गठन का भी निर्देश दिया और कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार और NIC से तकनीकी सहायता का आह्वान किया।
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वृद्ध और असाध्य बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए एक समान नीति अनिवार्य की।
- नीति का उद्देश्य छूट के लिए एक मानवीय, समयबद्ध तंत्र प्रदान करना और जेलों में भीड़भाड़ को संबोधित करना है।
- इसमें स्पष्ट पात्रता मानदंड और 'असाध्य बीमारी' की एक समान परिभाषा शामिल होनी चाहिए, जो UNODC दिशानिर्देशों से ली गई हो।
- मामलों का आकलन और प्रमाणीकरण करने के लिए स्वतंत्र चिकित्सा बोर्डों का गठन किया जाना है।
- केंद्र सरकार और NIC को नीति कार्यान्वयन के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करनी है।
परीक्षा तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट की पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता।
- नीति निर्माण की समय सीमा: तीन महीने।
- परामर्श निकाय: State Legal Services Authorities (SLSAs)।
- 'असाध्य बीमारी' की परिभाषा UNODC Handbook on Prisoners with Special Needs पर आधारित होगी।
- भारत में जेल अधिभोग दर: 31 दिसंबर, 2022 तक 131%।
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