Madras High Court Collegium और न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता संबंधी चिंताएं

यह लेख Madras High Court Collegium द्वारा न्यायाधीशों की सिफारिश से जुड़े विवाद पर चर्चा करता है। यह एक विशिष्ट उदाहरण पर प्रकाश डालता है जहां एक वरिष्ठ न्यायाधीश, Justice Nisha Banu को 'Collegium judge' पद के लिए दरकिनार कर एक कनिष्ठ न्यायाधीश, Justice M.S. Ramesh को प्राथमिकता दी गई। राज्य सरकार ने इस निर्णय के कानूनी अधिकार और प्रक्रियात्मक निरंतरता पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह स्थिति Collegium प्रणाली में पारदर्शिता की कमी, भाई-भतीजावाद और न्यायिक स्वतंत्रता तथा सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए सुधारों की आवश्यकता पर चल रही बहस को रेखांकित करती है। लेख का तर्क है कि जब संरचनात्मक अखंडता दांव पर हो तो चुप्पी कोई विकल्प नहीं है।

मुख्य बिंदु

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए Collegium प्रणाली न्यायिक मिसाल की देन है, न कि किसी कानून (statute) की।
  • Memorandum of Procedure (MoP) निर्देश देता है कि मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों को Collegium बनाना चाहिए।
  • स्थापित वरिष्ठता और प्रक्रियात्मक मानदंडों से विचलन न्यायपालिका और राज्य के बीच संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है।
  • राजनीतिक प्राथमिकता या वैचारिक वफादारी के आरोपों को रोकने के लिए चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।

परीक्षा तथ्य

  • भारत के संविधान का Article 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति को नियंत्रित करता है।
  • Memorandum of Procedure (MoP) न्यायिक नियुक्तियों के नियमों की रूपरेखा तैयार करता है।
  • हृदय-आधारित न्याय के महत्व के संबंध में Kural 541 का उल्लेख किया गया है।

पढ़ें। याद रखें। याद करें।

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