सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने निजी व्यक्तियों द्वारा दुरुपयोग रोकने के लिए मानहानि को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का आह्वान किया
Supreme Court के Justice M.M. Sundresh ने हाल ही में टिप्पणी की कि मानहानि (defamation) को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का समय आ गया है। उन्होंने निजी व्यक्तियों और राजनीतिक दलों द्वारा व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने के लिए आपराधिक मानहानि कानूनों के बढ़ते उपयोग पर चिंता व्यक्त की। हालांकि अदालत ने 2016 के Subramanian Swamy मामले में आपराधिक मानहानि की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन हालिया पीठें अधिक आलोचनात्मक रही हैं, जो अक्सर समन पर रोक लगाती हैं और 'बहुत अधिक संवेदनशील' न होने की सलाह देती हैं। बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या निजी पक्षों के बीच मानहानि से किसी सार्वजनिक हित की पूर्ति होती है या यह केवल Article 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाती है।
मुख्य बिंदु
- Justice M.M. Sundresh ने सुझाव दिया कि निजी व्यक्तियों द्वारा मानहानि को अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
- Supreme Court ने पहले 2016 में आपराधिक मानहानि को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'उचित प्रतिबंध' (reasonable restriction) के रूप में बरकरार रखा था।
- हालिया न्यायिक टिप्पणियां बताती हैं कि अदालतों को मानहानि के मामलों के माध्यम से राजनीतिक हिसाब चुकता करने का मंच नहीं होना चाहिए।
- अपराधिक मानहानि को अक्सर एक ऐसे उपकरण के रूप में देखा जाता है जो जीवन और प्रतिष्ठा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
परीक्षा तथ्य
- Subramanian Swamy versus Union of India मामला (2016)।
- संविधान का Article 19(1)(a) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार)।
- Justice M.M. Sundresh.
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