Judicial Collegium प्रणाली में पारदर्शिता और असहमति के प्रकटीकरण की आवश्यकता

यह लेख Supreme Court Collegium में पारदर्शिता की कमी पर चर्चा करता है, जिसे न्यायिक नियुक्ति के संबंध में Justice B.V. Nagarathna की हालिया असहमति द्वारा उजागर किया गया है। यह तर्क देता है कि न्यायपालिका के अपने प्रशासनिक निर्णयों में 'culture of justification' गायब है। जबकि Collegium प्रणाली वरिष्ठ न्यायाधीशों को शक्ति प्रदान करती है, नियुक्तियों या अस्वीकृतियों के लिए सार्वजनिक तर्क की कमी संस्थागत वैधता को कम करती है। लेखक का सुझाव है कि न्यायपालिका को खुद को खुलेपन के उन्हीं मानकों के अधीन करना चाहिए जो वह सरकार की अन्य शाखाओं से मांगती है ताकि सार्वजनिक विश्वास और लोकतांत्रिक जवाबदेही बनी रहे।

मुख्य बिंदु

  • Collegium प्रणाली Second (1993) और Third (1998) Judges Cases से उत्पन्न न्यायाधीश-निर्मित कानून का परिणाम है।
  • Collegium के भीतर असहमति शायद ही कभी सार्वजनिक की जाती है, जिससे न्यायिक नियुक्तियों में पूर्ण अपारदर्शिता की धारणा बनती है।
  • UK और दक्षिण अफ्रीका के साथ तुलना की गई है, जहाँ न्यायिक चयन प्रक्रियाओं में अधिक सार्वजनिक जांच शामिल होती है।
  • लोकतांत्रिक जवाबदेही और न्यायपालिका की अपनी वैधता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता को आवश्यक बताया गया है।

परीक्षा तथ्य

  • Second Judges Case (1993)
  • Third Judges Case (1998)
  • Justice B.V. Nagarathna (असहमत न्यायाधीश)

पढ़ें। याद रखें। याद करें।

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