सरोगेसी में जैविक माताओं के अधिकारों को बहाल करना: SC का हस्तक्षेप और कानूनी चुनौतियाँ
Supreme Court ने भारत के सरोगेसी कानूनों में जैविक माताओं के अधिकारों को संबोधित करने के लिए हस्तक्षेप किया है, विशेष रूप से दाता युग्मकों (donor gametes) के उपयोग के संबंध में। अदालत की टिप्पणियां प्रतिबंधात्मक नियमों और अधिक समावेशी ढांचे की आवश्यकता के कारण सरोगेसी चाहने वाले जोड़ों के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करती हैं। Surrogacy (Regulation) Act, 2021, और इसके बाद के नियमों की आलोचना की गई है कि वे बाधाएं पैदा करते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो अपने स्वयं के युग्मक (gametes) उत्पन्न करने में असमर्थ हैं। SC का रुख Article 21 के तहत पितृत्व के अधिकार पर जोर देता है, ऐसे संशोधनों के लिए दबाव डालता है जो नैतिक विचारों को व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करते हैं।
मुख्य बिंदु
- Supreme Court सरोगेसी में जैविक माताओं के अधिकारों को संबोधित कर रहा है, विशेष रूप से दाता युग्मकों (donor gametes) के संबंध में।
- Surrogacy (Regulation) Act, 2021 जैसे मौजूदा सरोगेसी कानूनों की अत्यधिक प्रतिबंधात्मक होने के लिए आलोचना की जाती है।
- SC Article 21 के तहत पितृत्व के अधिकार पर जोर देता है, अधिक समावेशी नियमों की वकालत करता है।
- कानूनी ढांचे को नैतिक विचारों को सरोगेसी चाहने वाले व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है।
परीक्षा तथ्य
- Surrogacy (Regulation) Act, 2021, भारत में सरोगेसी को नियंत्रित करता है।
- Surrogacy (Regulation) Rules, 2022, नियमों का और अधिक विवरण देते हैं।
- संविधान का Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, जिसमें पितृत्व का अधिकार भी शामिल है।
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