Supreme Court सुरक्षित रक्त आधान के लिए अनिवार्य Nucleic Acid Test (NAT) पर विचार कर रहा है

Supreme Court ने यह जांचने का निर्णय लिया है कि क्या ब्लड बैंकों के लिए HIV, Hepatitis B और Hepatitis C जैसी बीमारियों की पहचान के लिए Nucleic Acid Test (NAT) आयोजित करना अनिवार्य किया जाना चाहिए। वर्तमान में, कम संवेदनशील Enzyme-Linked Immunosorbent Assay (ELISA) परीक्षण अधिक सामान्य है। एक NGO द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि सुरक्षित रक्त आधान Article 21 के तहत Right to Life का एक मौलिक हिस्सा है। यह कदम थैलेसीमिया के उपचार के दौरान दूषित रक्त आधान के माध्यम से बच्चों के HIV से संक्रमित होने की रिपोर्टों के बाद उठाया गया है। Court ने सरकारी अस्पतालों में NAT को लागू करने की लागत-प्रभावशीलता और व्यवहार्यता पर डेटा मांगा है।

मुख्य बिंदु

  • NAT एक अत्यधिक संवेदनशील आणविक तकनीक है जो वायरस की आनुवंशिक सामग्री का पता लगाती है, जिससे पहचान के लिए 'window period' कम हो जाता है।
  • याचिका इस बात पर प्रकाश डालती है कि बार-बार रक्त आधान और दूषित रक्त के जोखिमों के कारण थैलेसीमिया के रोगी विशेष रूप से असुरक्षित हैं।
  • संविधान के Article 21 (Right to Life) का आह्वान सभी सरकारी अस्पतालों में सुरक्षित चिकित्सा प्रक्रियाओं की मांग करने के लिए किया जा रहा है।
  • Court इस बात की जांच कर रहा है कि यदि वर्तमान ELISA परीक्षणों की तुलना में NAT को अनिवार्य बनाया जाता है तो सरकारी अस्पतालों पर वित्तीय बोझ क्या होगा।

परीक्षा तथ्य

  • NAT का अर्थ Nucleic Acid Test है; ELISA का अर्थ Enzyme-Linked Immunosorbent Assay है।
  • भारतीय संविधान का Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
  • Thalassemia एक वंशानुगत रक्त विकार है जहां शरीर पर्याप्त हीमोग्लोबिन बनाने में विफल रहता है।

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