मंदिर प्रवेश विवादों में धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों को संतुलित करने में न्यायपालिका की भूमिका
मंदिर के रीति-रिवाजों और प्रवेश के संबंध में हाल के Madras High Court के फैसलों ने धार्मिक विवादों के निपटारे में न्यायपालिका की भूमिका पर प्रकाश डाला है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे मामलों को नागरिक अधिकार विवादों के रूप में माना जाता था, लेकिन 1950 के संविधान के बाद से, उन्हें Articles 25 और 26 के तहत मौलिक अधिकारों के नजरिए से देखा जाता है। अदालतें यह निर्धारित करने के लिए 'essential religious practice' टेस्ट का उपयोग करती हैं कि क्या कोई प्रथा धर्म का अभिन्न अंग है और राज्य के हस्तक्षेप से सुरक्षित है। हालांकि, धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन है। न्यायपालिका का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि धार्मिक प्रथाएं समानता और स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर न करें।
मुख्य बिंदु
- संविधान के Articles 25 और 26 राज्य के विनियमन के अधीन धर्म का पालन करने और उसे मानने के मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं।
- विशिष्ट अनुष्ठानों के संवैधानिक संरक्षण को निर्धारित करने के लिए Supreme Court द्वारा 'essential religious practice' टेस्ट विकसित किया गया था।
- Madras Hindu Religious and Charitable Endowments Act (1927) मंदिरों की आधुनिक राज्य निगरानी का अग्रदूत था।
- Sabarimala case (2018) धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक जांच के अधीन करने वाली अदालत का एक ऐतिहासिक उदाहरण है।
परीक्षा तथ्य
- संवैधानिक अनुच्छेद: Article 25 (अंतःकरण/धर्म की स्वतंत्रता) और Article 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता)।
- केस: Indian Young Lawyers Association and Ors vs State of Kerala (2018)।
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