मतदाता सूची के Special Intensive Revision में संवैधानिक चुनौतियां और न्यायिक विचलन (Judicial Drift)

यह लेख West Bengal और Bihar सहित विभिन्न राज्यों में Election Commission of India (ECI) द्वारा आयोजित मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) पर चर्चा करता है। यह 'न्यायिक विचलन' (judicial drift) के बारे में चिंता पैदा करता है जहां Supreme Court एक संवैधानिक निर्णायक के बजाय एक प्रशासक के रूप में कार्य करता है। SIR प्रक्रिया, जिसमें बड़े पैमाने पर संशोधन शामिल हैं, की आलोचना निवासियों पर नागरिकता के प्रमाण का बोझ डालकर कमजोर आबादी को मताधिकार से वंचित करने की संभावना के लिए की जा रही है। लेखक का तर्क है कि चल रहे SIR एक ऐसे अभ्यास के समान हैं जहाँ पूरी आबादी को बिना किसी पूर्व संदेह के अपनी नागरिकता स्थापित करने के लिए बुलाया जाता है।

मुख्य बिंदु

  • SIR प्रक्रिया में मतदाता सूची का थोक संशोधन शामिल है, जिससे अक्सर मनमानी कटौती और निवासियों के लिए कठिनाई होती है।
  • Representation of the People Act चुनाव आयोग (ECI) को विशेष संशोधन करने के लिए अधिकृत करता है, लेकिन वर्तमान SIR के पैमाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
  • 1995 के Lal Babu Hussein मामले ने स्थापित किया कि हटाने के नोटिस विशिष्ट व्यक्तियों को संदेह के प्रकट कारणों के साथ निर्देशित होने चाहिए।
  • वर्तमान SIR प्रक्रिया की आलोचना गैर-नागरिकता मानकर राज्य-नागरिक संबंधों को उलटने के लिए की जा रही है।

परीक्षा तथ्य

  • केस संदर्भ: Lal Babu Hussein and Others vs Electoral Registration Officer and Others (1995)।
  • कानूनी प्रावधान: Representation of the People Act (भारत का व्यापक चुनाव कानून)।
  • Form 7: किसी भी व्यक्ति द्वारा मतदाता सूची में किसी व्यक्ति को शामिल करने पर 'आपत्ति' करने के लिए उपयोग किया जाता है।

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