भारत में पर्यावरण न्यायशास्त्र की गिरावट और पारिस्थितिक संरक्षण का कमजोर होना
यह लेख भारत के पर्यावरण कानूनों और न्यायिक निरीक्षण के कमजोर होने की आलोचना करता है। यह हाल के Supreme Court के निर्णयों, जैसे Vanashakti vs Union of India (2025), पर प्रकाश डालता है, जिसने कथित तौर पर पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी (retrospective environmental clearances) को कमजोर कर दिया है। लेखक अरावली पहाड़ियों के पारिस्थितिक महत्व और हिमालय पर Char Dham राजमार्ग जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के प्रभाव पर चर्चा करते हैं। लेख का तर्क है कि विकास और संरक्षण के बीच 'संतुलन' अक्सर कॉर्पोरेट हितों के पक्ष में होता है, जो संविधान के Article 48A और Article 51A(g) को कमजोर करता है, जो पर्यावरण संरक्षण का आदेश देते हैं।
मुख्य बिंदु
- हालिया न्यायिक रुझान औद्योगिक और बुनियादी ढांचा विकास के पक्ष में पारिस्थितिक संरक्षण को कमजोर करने की ओर बदलाव दिखाते हैं।
- अरावली पहाड़ियाँ उत्तर-पश्चिमी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक रीढ़ के रूप में कार्य करती हैं, जो भूजल पुनर्भरण में सहायता करती हैं और मरुस्थलीकरण को रोकती हैं।
- ‘precautionary principle’ और ‘public trust doctrine’ को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (environmental impact assessments) की उदार व्याख्याओं द्वारा दरकिनार किया जा रहा है।
- हिमालय और मैंग्रोव जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति का कारण बन रही हैं।
परीक्षा तथ्य
- Article 48A (Directive Principles) और Article 51A(g) (Fundamental Duties) पर्यावरण संरक्षण से संबंधित हैं।
- M.C. Mehta vs Union of India (2004) और Common Cause vs Union of India (2017) ऐतिहासिक पर्यावरणीय मामले हैं।
- बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए लगभग 34,000 मैंग्रोव पेड़ों की कटाई को अधिकृत किया गया था।
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