राज्यपाल का बहिर्गमन (Walkouts): राज्यपाल की भूमिका की संवैधानिक सीमाओं का परीक्षण

विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा राज्य विधानसभा सत्रों से बहिर्गमन (walkout) के हालिया उदाहरणों ने संवैधानिक औचित्य पर बहस छेड़ दी है। Article 176(1) अनिवार्य करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में विधानसभा को संबोधित करें। कानूनी विशेषज्ञों और Nabam Rebia case (2016) और Shamsher Singh case (1974) सहित अदालती फैसलों ने इस बात पर जोर दिया है कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की 'सहायता और सलाह' (aid and advice) पर कार्य करना चाहिए। राज्यपाल का संबोधन सरकार की नीति का एक बयान होता है, और चुनिंदा रूप से पढ़ना या बहिर्गमन करना संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन हो सकता है।

मुख्य बिंदु

  • Article 176(1) राज्यपाल के लिए वर्ष के पहले सत्र को संबोधित करना अनिवार्य बनाता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने लगातार यह माना है कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां सीमित हैं और संविधान में स्पष्ट रूप से बताई गई हैं।
  • राज्यपाल का संबोधन राज्य कैबिनेट द्वारा तैयार किया जाता है और सरकार की नीति को दर्शाता है।
  • 2016 के Nabam Rebia case ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल का कार्यक्षेत्र विशिष्ट संवैधानिक प्रावधानों तक ही सीमित है।

परीक्षा तथ्य

  • Article 176(1) (राज्यपाल का विशेष संबोधन)
  • Nabam Rebia case (2016)
  • Shamsher Singh versus State of Punjab (1974)

पढ़ें। याद रखें। याद करें।

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