बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण हिमालय में पर्यावरणीय जोखिम और पारिस्थितिक गिरावट

चार धाम सड़क चौड़ीकरण जैसी आक्रामक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण हिमालयी क्षेत्र 'ecocide' का सामना कर रहा है। 2025 में, जलवायु-प्रेरित आपदाओं के कारण हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 4,000 से अधिक मौतें हुईं। लेख प्राचीन देवदार के पेड़ों के 'translocating' की आलोचना करता है, जो पारिस्थितिक रूप से त्रुटिपूर्ण है। परियोजनाएं अक्सर Environmental Impact Assessments (EIA) की अनदेखी करती हैं और अनुचित सड़क-चौड़ाई मानकों का उपयोग करती हैं, जिससे ढलान अस्थिरता और भूस्खलन होता है। हिमालय की संवेदनशीलता बढ़ रही है क्योंकि उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में 50% तेजी से गर्म हो रहे हैं। वैचारिक या आर्थिक आवश्यकता के बजाय आपदा लचीलेपन (disaster resilience) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

मुख्य बिंदु

  • देवदार (Deodar) के जंगल मिट्टी की स्थिरता, बाढ़ की रोकथाम और गंगा नदी की पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • 1950 के बाद से उच्च ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में 50% तेजी से गर्म हो रहे हैं।
  • National Action Plan on Climate Change के तहत National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem (NMSHE) की स्थापना की गई थी।
  • बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अक्सर हिमालयी भूविज्ञान के 'angle of repose' की अनदेखी करती हैं, जिससे निरंतर अस्थिरता पैदा होती है।

परीक्षा तथ्य

  • 2025 में हिमालय में जलवायु आपदाओं के कारण 4,000 से अधिक मौतें हुईं।
  • NMSHE को 2014 में मंजूरी दी गई थी।
  • उच्च ऊंचाई पर वार्मिंग वैश्विक औसत से 50% तेज है।

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