सुप्रीम कोर्ट प्रवर्तन निदेशालय (ED) की 'Juristic Person' के रूप में कानूनी स्थिति की जांच करेगा

सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु और केरल की उन याचिकाओं की जांच कर रहा है जिनमें सवाल उठाया गया है कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED) एक 'juristic person' है जिसे Article 226 के तहत उच्च न्यायालयों में जाने का अधिकार है। राज्यों का तर्क है कि ED एक वैधानिक रचना (statutory creation) है, न कि 'व्यक्ति' या 'निकाय कॉर्पोरेट' (body corporate), और इस प्रकार इसमें प्राकृतिक व्यक्ति की तरह मुकदमा करने या मुकदमा झेलने की कानूनी स्थिति का अभाव है। यह कानूनी चुनौती ED द्वारा अपने अधिकारियों के खिलाफ राज्य के नेतृत्व वाली जांच को रोकने के प्रयासों के बाद आई है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला केंद्रीय जांच एजेंसियों की कानूनी स्थिति और मुकदमेबाजी की शक्तियों को स्पष्ट करेगा।

मुख्य बिंदु

  • एक 'juristic person' एक कानूनी कल्पना (legal fiction) है जिसे एक निगम के समान अधिकार और कर्तव्य प्राप्त होते हैं।
  • केरल और तमिलनाडु का तर्क है कि ED, एक वैधानिक एजेंसी होने के नाते, उन शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकती जो उसके शासी कानून द्वारा विशेष रूप से प्रदान नहीं की गई हैं।
  • यह मामला तब उत्पन्न हुआ जब ED ने केरल सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी जिसमें ED अधिकारियों के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक जांच आयोग (Commission of Inquiry) का गठन किया गया था।
  • राज्यों का तर्क है कि केवल विशिष्ट वैधानिक शक्ति वाला निकाय कॉर्पोरेट ही juristic person के रूप में कानूनी स्थिति का दावा कर सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने ED को नोटिस जारी किया है और मामले को चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

परीक्षा तथ्य

  • संविधान का Article 226 उच्च न्यायालयों की कुछ रिट जारी करने की शक्ति से संबंधित है।
  • मामले की सुनवाई जस्टिस Dipankar Datta और Satish Chandra Sharma की बेंच कर रही है।
  • केरल सरकार ने ED अधिकारियों के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए मई 2021 में एक जांच आयोग का गठन किया था।

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