भारत में Artificial Intelligence विकास के पर्यावरणीय प्रभाव और कार्बन फुटप्रिंट का आकलन
जैसे-जैसे AI का एकीकरण बढ़ रहा है, इसकी पर्यावरणीय लागत, जिसमें उच्च बिजली की खपत और कार्बन उत्सर्जन शामिल है, जांच के दायरे में आ रही है। रिपोर्टों से पता चलता है कि ICT उद्योग वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 1.8%-2.8% हिस्सा है। एक अकेला AI प्रॉम्प्ट मानक खोज (standard search) की तुलना में काफी अधिक ऊर्जा की खपत कर सकता है। लेख में भारत से अपने Environmental Impact Assessment (EIA) ढांचे के भीतर AI प्रभाव आकलन को शामिल करने का आह्वान किया गया है। यह बड़े पैमाने के एल्गोरिदम के नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए डेटा केंद्रों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करने और UNESCO’s Recommendation on the Ethics of AI जैसे अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का पालन करने जैसे टिकाऊ अभ्यासों को अपनाने का सुझाव देता है।
मुख्य बिंदु
- एक एकल Large Language Model (LLM) को प्रशिक्षित करने से लगभग 300,000 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन हो सकता है।
- AI सर्वर 2027 तक कूलिंग के लिए 6.6 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का उपयोग कर सकते हैं, जिससे पानी की कमी की चिंता पैदा हो सकती है।
- भारत को अनिवार्य प्रकटीकरण मानकों के माध्यम से बड़े AI एल्गोरिदम विकसित करने की पर्यावरणीय लागत को मापने की आवश्यकता है।
- टिकाऊ अभ्यासों में प्री-ट्रेंड मॉडल तैनात करना और डेटा केंद्रों को बिजली देने के लिए नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग करना शामिल है।
परीक्षा तथ्य
- UNESCO’s Recommendation on the Ethics of AI (2021)
- EIA Notification 2006
- UNEP study 'Navigating New Horizons' (July 2024)
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