फलटण केस: यौन अपराधों के मुकदमों में पीड़ित की गरिमा और कानूनी सुरक्षा की रक्षा

महाराष्ट्र में एक महिला डॉक्टर की आत्महत्या से जुड़े फलटण मामले ने आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ित की गरिमा की रक्षा की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। भारतीय न्यायशास्त्र, Bharatiya Sakshya Adhiniyam (BSA) 2023 और Evidence Act की Section 53A के माध्यम से, पीड़ित के 'सामान्य अनैतिक चरित्र' या पिछले यौन अनुभव को बचाव के रूप में उपयोग करने पर रोक लगाता है। Supreme Court ने लगातार यह फैसला सुनाया है कि पीड़ित की गवाही को कथित 'ढीले चरित्र' के आधार पर संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। लेख इस बात पर जोर देता है कि केवल विधायी परिवर्तन ही पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव न आए और चरित्र हनन के माध्यम से 'द्वितीयक उत्पीड़न' (secondary victimisation) को रोकने के लिए पुलिस और न्यायपालिका को बेहतर प्रशिक्षण न दिया जाए।

मुख्य बिंदु

  • Bharatiya Sakshya Adhiniyam (BSA), 2023, Indian Evidence Act का स्थान लेता है और पीड़ितों के चरित्र हनन पर प्रतिबंध को बरकरार रखता है।
  • BNS की Section 72 (पूर्व में Section 228A IPC) सार्वजनिक अपमान को रोकने के लिए यौन शोषण पीड़ितों की पहचान उजागर न करने का आदेश देती है।
  • State of Punjab vs Gurmit Singh & Ors. (1996) में Supreme Court ने फैसला सुनाया कि पीड़ित की गवाही को चरित्र के आधार पर संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
  • 'दूसरा अपराध' (second crime) उस सार्वजनिक चरित्र हनन और पीड़ित को दोषी ठहराने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है जो अक्सर मूल अपराध के बाद होता है, यहाँ तक कि सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा भी।

परीक्षा तथ्य

  • Indian Evidence Act, 1872 की Section 53A (अब BSA, 2023 की Section 50)।
  • Indian Penal Code की Section 228A (अब BNS की Section 72)।
  • Criminal Law (Amendment) Act, 2013, जिसे अक्सर 'Nirbhaya Act' कहा जाता है।

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