अरावली का प्रश्न: रणनीतिक खनिज आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन

अरावली पहाड़ियों को उन 'रणनीतिक छूटों' से खतरा है जो महत्वपूर्ण खनिजों के खनन के लिए पर्यावरणीय जांच को दरकिनार करती हैं। हालांकि Supreme Court ने खनन को प्रतिबंधित करने के लिए 'अरावली पहाड़ियों' और 'अरावली श्रृंखला' को परिभाषित करने की कोशिश की है, लेकिन सरकार अक्सर 'राष्ट्रीय रक्षा' या 'रणनीतिक विचारों' के लिए कार्यकारी विवेक का उपयोग करती है। Forest (Conservation) Act में 2023 के संशोधन ने छूट के दायरे को और बढ़ा दिया है। यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और लिथियम और दुर्लभ-पृथ्वी तत्वों (rare-earth elements) जैसे खनिजों की औद्योगिक मांग के बीच संघर्ष पैदा करता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि इन संघर्षों के समाधान के लिए एक पारदर्शी ढांचे की आवश्यकता है, जो सतत विकास और अरावली की महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

मुख्य बिंदु

  • अरावली पहाड़ियाँ भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अवैध खनन और शहरी विस्तार के दबाव का सामना कर रही हैं।
  • हालिया कानूनी लड़ाई खनन निषेध को लागू करने के लिए अरावली के भौगोलिक विस्तार को परिभाषित करने पर केंद्रित है।
  • Forest (Conservation) Amendment Act, 2023, 'रणनीतिक' और 'सुरक्षा संबंधी' परियोजनाओं के लिए व्यापक छूट प्रदान करता है।
  • हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए एक स्पष्ट ढांचे की कमी है।

परीक्षा तथ्य

  • संबंधित कानून: Forest (Conservation) Amendment Act, 2023।
  • शामिल खनिज: लिथियम, दुर्लभ-पृथ्वी तत्व (rare-earth elements), टंगस्टन।
  • न्यायालय: Supreme Court of India (20 नवंबर और 23 दिसंबर के आदेश)।

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