Post Facto Environmental Clearances पर Supreme Court के समीक्षा निर्णय ने नियामक ढील पर चिंताएं बढ़ाईं
Supreme Court के हालिया 2:1 बहुमत के फैसले ने post facto environmental clearances (ECs) पर अपने पिछले रुख की समीक्षा की है। इससे पहले, अदालत ने ऐसी पूर्वव्यापी मंजूरियों को अवैध घोषित किया था, इस बात पर जोर देते हुए कि पर्यावरणीय कानूनों को अपरिवर्तनीय क्षति को रोकने के लिए पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है। नया निर्णय सुझाव देता है कि कुछ स्थितियों में, पूर्ण परियोजनाओं को रोकने जैसे 'जनहित' के मुद्दों से बचने के लिए पूर्वव्यापी ECs की अनुमति दी जा सकती है। आलोचकों का तर्क है कि यह 'precautionary principle' और 'polluter pays' सिद्धांत को कमजोर करता है, जिससे उद्योगों को प्रारंभिक नियमों को दरकिनार करने और बाद में जुर्माने के माध्यम से नियमितीकरण की मांग करने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है, जो स्थापित पर्यावरणीय न्यायशास्त्र से पीछे हटने का संकेत है।
मुख्य बिंदु
- यह निर्णय post facto environmental clearances की वैधता के संबंध में 2025 के CREDAI vs Vanashakti मामले की समीक्षा करता है।
- बहुमत का विचार है कि पूर्वव्यापी मंजूरियों पर पूर्ण प्रतिबंध से पूरी हो चुकी परियोजनाओं के लिए आर्थिक बर्बादी हो सकती है।
- Justice Ujjal Bhuyan की असहमतिपूर्ण राय चेतावनी देती है कि यह सिद्धांतों के बजाय सुविधा की ओर झुकाव है।
- 1994 और 2006 की Environmental Impact Assessment (EIA) सूचनाएं इस संदर्भ में बहस के मुख्य वैधानिक ढांचे हैं।
परीक्षा तथ्य
- CREDAI vs Vanashakti मामला (2025) केंद्रीय कानूनी संदर्भ है।
- संविधान के Article 21 (स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण का अधिकार) को एक मौलिक अधिकार के रूप में उद्धृत किया गया था।
- Common Cause vs Union of India (2017) के फैसले में पहले पूर्वव्यापी मंजूरियों को पर्यावरण के लिए हानिकारक माना गया था।
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