भारत में Contempt of Court के कानूनी ढांचे और संवैधानिक आधार को समझना
लेख भारत में 'Contempt of Court' की अवधारणा की व्याख्या करता है, जो संविधान के Articles 129 और 215 में निहित है, जो Supreme Court और High Courts को 'courts of record' के रूप में नामित करते हैं। Contempt of Courts Act, 1971, अवमानना को नागरिक (civil - जानबूझकर अवज्ञा) और आपराधिक (criminal - अदालत को कलंकित करना) में वर्गीकृत करता है। हालांकि किसी तय मामले की निष्पक्ष आलोचना अवमानना नहीं है, लेकिन न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करने वाली या अदालत के अधिकार को कम करने वाली टिप्पणियां दंडनीय हैं। अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और संवैधानिक नैतिकता सुनिश्चित करने के लिए इन अदालतों में निहित है।
मुख्य बिंदु
- Article 129 (Supreme Court) और Article 215 (High Courts) इन संस्थानों को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने का अधिकार देते हैं।
- नागरिक अवमानना (Civil contempt) में किसी भी निर्णय या डिक्री की जानबूझकर अवज्ञा शामिल है, जबकि आपराधिक अवमानना (Criminal contempt) में अदालत के अधिकार को कलंकित करना या कम करना शामिल है।
- Supreme Court या High Court में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए आमतौर पर Attorney General या Advocate General की सहमति आवश्यक होती है।
- किसी निर्णय की निष्पक्ष आलोचना एक स्थापित सिद्धांत है और अवमानना नहीं है जब तक कि यह निष्पक्ष टिप्पणी की सीमाओं का उल्लंघन न करे।
परीक्षा तथ्य
- Contempt of Courts Act, 1971 अवमानना की वैधानिक परिभाषा और वर्गीकरण प्रदान करता है।
- संविधान का Article 19(2) अदालत की अवमानना के संबंध में भाषण की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
- महत्वपूर्ण मामला: M. V. Jayarajan बनाम High Court of Kerala (2015) ने सार्वजनिक भाषण में अपमानजनक भाषा के लिए अवमानना को बरकरार रखा।
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