भारतीय शासन में संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का विकास और न्यायिक अनुप्रयोग

संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का तात्पर्य केवल इसके शाब्दिक पाठ के बजाय संविधान की भावना और परंपराओं के पालन से है। डॉ. B.R. Ambedkar ने प्रसिद्ध रूप से तर्क दिया था कि संवैधानिक नैतिकता विकसित की जानी चाहिए, क्योंकि भारत में लोकतंत्र अनिवार्य रूप से एक अलोकतांत्रिक भूमि पर 'top-dressing' की तरह है। न्यायपालिका ने राज्य की मनमानी कार्रवाइयों पर अंकुश लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इस अवधारणा का तेजी से उपयोग किया है। Sabarimala निर्णय और Manoj Narula vs Union of India जैसे ऐतिहासिक मामलों ने कानून के शासन को बनाए रखने और राज्य के पदाधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए इस सिद्धांत को लागू किया है।

मुख्य बिंदु

  • संवैधानिक नैतिकता में संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच औचित्य और आचरण के नियम शामिल हैं जो लिखित कानून से परे जाते हैं।
  • डॉ. B.R. Ambedkar ने संविधान के प्रति 'भावुक लगाव' (passionate attachment) की आवश्यकता पर जोर देने के लिए इतिहासकार George Grote से यह अवधारणा ली थी।
  • Supreme Court इस सिद्धांत का उपयोग उन कार्रवाइयों को रद्द करने के लिए करता है जो मनमानी हैं या संविधान के मूल मूल्यों का उल्लंघन करती हैं।
  • यह नैतिकता और कानून के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करता है कि शासन में न्याय और समानता की भावना बनी रहे।

परीक्षा तथ्य

  • Indian Young Lawyers Association vs The State of Kerala (2018) - Sabarimala मामला।
  • Manoj Narula vs Union of India - Article 75 और मंत्रियों की अयोग्यता के संबंध में।
  • S.P. Gupta मामला - संवैधानिक परंपराओं पर Justice Venkataramiah की टिप्पणियां।

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