चेनाब नदी पर Sawalkote Hydroelectric Project की रणनीतिक और पारिस्थितिक चुनौतियां

चेनाब नदी पर 1.8-GW की Sawalkote Hydroelectric Project, भारत द्वारा Indus Waters Treaty (IWT) वार्ता को स्थगित करने के बाद गति पकड़ रही है। हालांकि यह परियोजना भू-राजनीतिक महत्व रखती है और इसका उद्देश्य पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार को क्रियान्वित करना है, लेकिन इसे गंभीर पारिस्थितिक चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है। चेनाब में पहले से ही कई "बम्पर-टू-बम्पर" परियोजनाएं हैं, जिससे उच्च तलछट भार और ढलान अस्थिरता जैसे संचयी प्रभाव पड़ रहे हैं। इस परियोजना के लिए 1,500 परिवारों के पुनर्वास और 847 हेक्टेयर वन के डायवर्जन की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञ राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ पारिस्थितिक जिम्मेदारी को संतुलित करने के लिए क्षेत्रीय अध्ययन और डेटा पारदर्शिता की वकालत करते हैं।

मुख्य बिंदु

  • Sawalkote परियोजना जम्मू और कश्मीर में चेनाब नदी पर नियोजित 1.8-GW की रन-ऑफ-रिवर योजना है।
  • पहलगाम हमले के बाद Indus Waters Treaty के निलंबन के बाद इस परियोजना को एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
  • पारिस्थितिक जोखिमों में हिमालयी क्षेत्र में संचयी तलछट भार और बढ़ती ढलान अस्थिरता शामिल है।
  • परियोजना में महत्वपूर्ण सामाजिक लागतें शामिल हैं, जिसमें लगभग 1,500 परिवारों का विस्थापन शामिल है।

परीक्षा तथ्य

  • चेनाब नदी पर इस परियोजना की क्षमता 1.8 GW है।
  • Indus Waters Treaty (IWT) पर 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षर किए गए थे।
  • मुद्रास्फीति और प्रशासनिक देरी के कारण परियोजना की लागत में ₹9,000 करोड़ की वृद्धि हुई है।

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