ग्रेट निकोबार परियोजना (Great Nicobar Project) ने पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के कानूनी व्यक्तित्व (Legal Personhood) पर बहस छेड़ दी है

बहु-करोड़ी ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना, जिसमें एक पावर प्लांट, ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और एयरपोर्ट शामिल है, 13,000 हेक्टेयर प्राचीन जंगलों पर इसके प्रभाव के कारण जांच का सामना कर रही है। लेख 'प्रकृति के अधिकार' (rights of nature) कानूनी ढांचे पर चर्चा करता है, जहां नदियों और जंगलों जैसी गैर-मानवीय संस्थाओं को कानूनी व्यक्तित्व (legal personhood) प्रदान किया जाता है। यह 2013 के नियमगिरि हिल्स (Niyamgiri Hills) के फैसले का संदर्भ देता है, जिसने आदिवासी संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए ग्राम सभा की शक्ति को बरकरार रखा था। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 2017 के फैसले, जिसमें गंगा और यमुना नदियों को कानूनी व्यक्तित्व प्रदान किया गया था, को भारत में प्रकृति के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक मिसाल के रूप में उद्धृत किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए एक नया कानूनी रास्ता प्रदान कर सकता है।

मुख्य बिंदु

  • ग्रेट निकोबार परियोजना एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट (biodiversity hotspot) और महत्वपूर्ण जलवायु नियामक को प्रभावित करती है।
  • 'प्रकृति के अधिकार' या 'पृथ्वी न्यायशास्त्र' (earth jurisprudence) दृष्टिकोण पारिस्थितिकी तंत्र को कानूनी दर्जा देता है, जिससे वे अधिकारों के विषय बन सकते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के नियमगिरि (Niyamgiri) फैसले (2013) ने वन डायवर्जन मामलों में जनजातीय परिषद और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) की भूमिका पर जोर दिया।
  • कोलंबिया के अत्रातो नदी (Atrato River) मामले जैसे अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण समुदाय के नेतृत्व वाली पर्यावरणीय संरक्षकता पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

परीक्षा तथ्य

  • नियमगिरि हिल्स (Niyamgiri Hills) फैसला (2013): उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय।
  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय (2017) ने गंगा और यमुना नदियों को कानूनी व्यक्तित्व (legal personhood) प्रदान किया।
  • वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) 2006 में लागू किया गया था।

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