Supreme Court ने दस भारतीय राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिकता की जांच की
Supreme Court दस भारतीय राज्यों द्वारा अधिनियमित 'Freedom of Religion' Acts की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। ये कानून, जिन्हें अक्सर धर्मांतरण विरोधी कानून कहा जाता है, प्रलोभन, धोखाधड़ी या बल के माध्यम से धर्मांतरण को रोकने का लक्ष्य रखते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये कानून 'वस्तुतः धर्मांतरण विरोधी' हैं और Article 25 के तहत धर्म को मानने और प्रचार करने के मौलिक अधिकार पर 'chilling effect' डालते हैं। Court 'कपटपूर्ण' (deceitful) धर्मांतरण की परिभाषा पर सवाल उठा रहा है और क्या ये कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतर-धार्मिक विवाहों में जीवन साथी चुनने के अधिकार में हस्तक्षेप करते हैं।
मुख्य बिंदु
- दस भारतीय राज्यों ने कड़े धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, जिन्हें संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए चुनौती दी जा रही है।
- संविधान का Article 25 सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन, धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने के अधिकार की गारंटी देता है।
- आलोचकों का तर्क है कि इन कानूनों में सबूत का बोझ (burden of proof) अक्सर धर्मांतरित व्यक्ति पर होता है, जो असंवैधानिक हो सकता है।
- इन कानूनों की अंतर-धार्मिक विवाहों पर उनके प्रभाव और तीसरे पक्षों द्वारा आपराधिक शिकायतें दर्ज करने की संभावना के लिए जांच की जा रही है।
परीक्षा तथ्य
- Article 25: Freedom of conscience and free profession, practice and propagation of religion.
- ऐसे कानूनों वाले राज्य: UP, Himachal Pradesh, MP, Uttarakhand, Gujarat, Chhattisgarh, Haryana, Jharkhand, Karnataka, Rajasthan.
- इनमें से कुछ कानूनों के तहत सजा में न्यूनतम 20 साल की सजा या आजीवन कारावास शामिल है।
पढ़ें। याद रखें। याद करें।
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