Supreme Court ने मानसिक स्वास्थ्य को Article 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना

ऐतिहासिक Sukdeb Saha vs The State of Andhra Pradesh मामले में, Supreme Court ने फैसला सुनाया कि मानसिक स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के Article 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। यह मामला एक NEET उम्मीदवार की आत्महत्या से उत्पन्न हुआ, जो भारत में छात्र आत्महत्याओं की महामारी को उजागर करता है। अदालत ने 'Saha Guidelines' जारी कीं, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों को सक्रिय रूप से सहायता प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। यह निर्णय आत्महत्याओं को व्यक्तिगत विफलताओं के रूप में देखने के बजाय उन्हें प्रणालीगत उपेक्षा और 'संरचनात्मक हिंसा' (structural violence) के परिणाम के रूप में पहचानने की ओर दृष्टिकोण बदलता है, और मनोवैज्ञानिक कल्याण के लिए राज्य की जिम्मेदारी अनिवार्य करता है।

मुख्य बिंदु

  • SC ने मानसिक स्वास्थ्य को Mental Healthcare Act 2017 के तहत एक वैधानिक अधिकार से बढ़ाकर Article 21 के तहत एक मौलिक अधिकार कर दिया है।
  • 'Saha Guidelines' स्कूलों और कॉलेजों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली और जिला-स्तरीय निगरानी समितियां स्थापित करने का आदेश देती हैं।
  • यह फैसला छात्र आत्महत्याओं में संस्थागत उपेक्षा के योगदान का वर्णन करने के लिए 'संरचनात्मक हिंसा' (structural violence) की अवधारणा पेश करता है।
  • निर्णय इस बात पर जोर देता है कि जीवन के अधिकार में मनोवैज्ञानिक अखंडता और विषाक्त प्रतिस्पर्धी वातावरण से सुरक्षा शामिल है।

परीक्षा तथ्य

  • Sukdeb Saha vs The State of Andhra Pradesh मामला।
  • भारतीय संविधान का Article 21 (जीवन का अधिकार)।
  • Mental Healthcare Act, 2017।
  • शैक्षणिक संस्थानों के लिए Saha Guidelines।

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