Supreme Court ने DNA Evidence की अखंडता बनाए रखने के लिए समान दिशानिर्देश जारी किए
कट्टावेल्लई @ देवाकर बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में, भारत के Supreme Court ने आपराधिक जांच में DNA Evidence की अखंडता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए। अदालत ने कस्टडी की श्रृंखला (chain of custody) में बार-बार होने वाली चूक और फोरेंसिक परीक्षण में अस्पष्टीकृत देरी को देखा। नए दिशानिर्देशों के लिए 'Chain of Custody Register' बनाने, 48 घंटों के भीतर प्रयोगशालाओं में नमूनों के त्वरित परिवहन और जांच अधिकारियों द्वारा सख्त दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत DNA साक्ष्य 'राय साक्ष्य' (opinion evidence) है और इसे मुकदमे में ठोस होने के लिए वैज्ञानिक और कानूनी रूप से सिद्ध किया जाना चाहिए।
मुख्य बिंदु
- जांच अधिकारी अब FSL को DNA नमूनों के सुरक्षित और समय पर परिवहन के लिए कड़ाई से जिम्मेदार हैं।
- एक अनिवार्य 'Chain of Custody Register' बनाए रखा जाना चाहिए और इसे ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड के साथ संलग्न किया जाना चाहिए।
- संदूषण या क्षरण को रोकने के लिए DNA नमूने संग्रह के 48 घंटों के भीतर प्रयोगशाला तक पहुंचने चाहिए।
- DNA साक्ष्य को संभालने में चूक से अदालतों द्वारा इसे खारिज किया जा सकता है, जैसा कि पिछले कई फैसलों में देखा गया है।
परीक्षा तथ्य
- प्रासंगिक मामला: कट्टावेल्लई @ देवाकर बनाम तमिलनाडु राज्य।
- कानूनी प्रावधान: Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की धारा 39 (पूर्व में Evidence Act की धारा 45)।
- नमूना परिवहन समय सीमा: 48 घंटे।
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