भारत-चीन सीमा विवाद: Special Representatives का इतिहास और समाधान की खोज
यह लेख 2003 से नियुक्त Special Representatives (SRs) की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत-चीन सीमा वार्ता के इतिहास का पता लगाता है। 2005 के Political Parameters समझौते के बावजूद, एक अंतिम समाधान अभी भी दूर है। घर्षण के प्रमुख बिंदुओं में तवांग की स्थिति और सिक्किम-तिब्बत सीमा के लिए 'संरेखण का आधार' (basis of alignment) शामिल है, विशेष रूप से तीस्ता और अमो चू नदियों के पास। 2017 के डोकलाम संकट ने भूटान से जुड़े ट्राइजंक्शन (trijunctions) की जटिलता को उजागर किया। हालांकि दोनों पक्षों ने 24 दौर की वार्ता की है, लेकिन 2020 के बाद से हालिया सैन्य गतिरोध ने प्रगति को रोक दिया है। तकनीकी ढांचे को जमीनी स्तर के समाधान में बदलने के लिए एक उच्च स्तरीय राजनीतिक मंजूरी आवश्यक मानी जाती है।
मुख्य बिंदु
- सीमा वार्ता को राजनीतिक गति प्रदान करने के लिए 2003 में Special Representatives (SR) तंत्र की स्थापना की गई थी।
- 2005 का 'Political Parameters and Guiding Principles' समझौता SR प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर बना हुआ है।
- 'watershed principle' और अरुणाचल प्रदेश में आबादी वाले क्षेत्रों की स्थिति पर असहमति बनी हुई है।
- डोकलाम के पास भूटान से जुड़े ट्राइजंक्शन पॉइंट संवेदनशील क्षेत्र बने हुए हैं जिनके लिए त्रिपक्षीय परामर्श की आवश्यकता है।
परीक्षा तथ्य
- प्रथम SRs: Brajesh Mishra (भारत) और Dai Bingguo (चीन).
- समझौते का वर्ष: 2005 (Political Parameters and Guiding Principles).
- आयोजित SR वार्ता दौरों की संख्या: 24.
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