विश्वास और छात्र की आवाज के माध्यम से विश्वविद्यालयों को पुनः प्राप्त करना
भारत में शैक्षणिक संस्थान गंभीर शासन संकट का सामना कर रहे हैं, जो संस्थागत स्वायत्तता के ह्रास, प्रशासनिक अतिरेक (overreach) और घटते सार्वजनिक वित्त पोषण (funding) द्वारा चिह्नित हैं। छात्र स्वतंत्रता का ह्रास, कुलपतियों की पक्षपातपूर्ण नियुक्तियाँ, और आलोचनात्मक संवाद के लिए सिकुड़ते स्थान उच्च शिक्षा के मूलभूत लोकाचार को खतरे में डालते हैं। शैक्षणिक उत्कृष्टता को बहाल करने के लिए, विश्वविद्यालयों को शासन के 'स्वतंत्रता मॉडल' को अपनाना चाहिए जो विश्वास को बढ़ावा दे, असहमति की रक्षा करे, पारदर्शी संकाय नियुक्तियों को सुनिश्चित करे, और राजनीतिक हस्तक्षेप से संस्थागत अखंडता की रक्षा करे।
मुख्य बिंदु
- भारतीय विश्वविद्यालय घटती स्वायत्तता, प्रशासनिक अतिरेक और छात्रों तथा अधिकारियों के बीच विश्वास की कमी से जूझ रहे हैं।
- कुलपतियों और प्रशासकों की नियुक्ति में लगातार हस्तक्षेप संस्थागत विश्वसनीयता और शैक्षणिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
- उच्च शिक्षा में सार्वजनिक निवेश स्थिर हो गया है, जिससे परिसर के बुनियादी ढांचे में गिरावट और तनावपूर्ण शैक्षणिक संसाधन पैदा हो रहे हैं।
- छात्रों को सशक्त बनाने, शांतिपूर्ण असहमति को प्रोत्साहित करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए शासन के 'स्वतंत्रता मॉडल' को अपनाना आवश्यक है।
परीक्षा तथ्य
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में शिक्षा में सार्वजनिक निवेश को जीडीपी के 6% तक पहुँचाने की परिकल्पना की गई थी।
- शिक्षा में सार्वजनिक निवेश 4%-4.1% के आसपास मंडरा रहा है।
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