पारंपरिक आहार भारतीय जनजातियों के अद्वितीय आंत रोगाणुओं को आकार देते हैं, बायोबैंकिंग की आवश्यकता है
आठ भारतीय आदिवासी आबादी पर किए गए शोध से पता चला है कि उनके पारंपरिक आहार अद्वितीय आंत माइक्रोबायोम (gut microbiomes) को बढ़ावा देते हैं, जो औद्योगिक आबादी से अलग हैं। Gut Microbes में प्रकाशित अध्ययन, इस माइक्रोबियल विविधता को संरक्षित करने और क्षेत्र-विशिष्ट प्रोबायोटिक (probiotic) उपचार विकसित करने के लिए बायोबैंकिंग (biobanking) की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। ट्रांस-हिमालयी जनजातियों में, जो उच्च डेयरी उत्पादों का सेवन करती हैं, अधिक विविध माइक्रोबायोम पाया गया, जिसमें Bifidobacterium adolescentis का एक विशिष्ट स्ट्रेन भी शामिल है, जो बेहतर आंत स्वास्थ्य से जुड़ा है। ये निष्कर्ष भारत के अद्वितीय माइक्रोबियल परिदृश्य और इन स्वदेशी माइक्रोबायोम पर वैश्वीकरण के संभावित प्रभाव को रेखांकित करते हैं।
मुख्य बिंदु
- भारतीय आदिवासी आबादी के पास उनके पारंपरिक आहार द्वारा आकार दिए गए अद्वितीय आंत माइक्रोबायोम हैं।
- ये माइक्रोबायोम औद्योगिक सेटिंग्स में पाए जाने वाले माइक्रोबायोम से काफी भिन्न हैं।
- शहरीकरण द्वारा इस विविधता के क्षरण से पहले स्वदेशी माइक्रोबायोम की बायोबैंकिंग महत्वपूर्ण है।
- ट्रांस-हिमालयी जनजातियों में उच्च डेयरी खपत Bifidobacterium adolescentis जैसे विशिष्ट लाभकारी जीवाणु स्ट्रेन से जुड़ी है।
- अध्ययन भारतीय समुदायों के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट प्रोबायोटिक हस्तक्षेपों की वकालत करता है।
परीक्षा तथ्य
- अध्ययन इसमें प्रकाशित हुआ: Gut Microbes।
- अध्ययन की गई आदिवासी आबादी की संख्या: आठ।
- पहचाना गया प्रमुख जीवाणु: Bifidobacterium adolescentis।
- शामिल अनुसंधान संस्थान: National Centre for Cell Science (NCCS), पुणे।
- उल्लेखित पहल: Indian Human Microbiome Initiative।
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