मानवीय गतिविधियां असम की घातक बाढ़ को तेज करती हैं, विज्ञान-समर्थित समाधानों की मांग
असम की हालिया विनाशकारी बाढ़, जिसमें 98 लोगों की जान चली गई, केवल अत्यधिक वर्षा के कारण नहीं है, बल्कि खनन, उत्खनन (quarrying), वनों की कटाई और झूम खेती जैसी मानवीय गतिविधियों से काफी तेज हो गई है। ये प्रथाएं पहाड़ी ढलानों को अस्थिर करती हैं, जिससे वे कटाव और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं, खासकर नागालैंड में Dikhow River के ऊपरी इलाकों में। मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने इसे केवल 'राष्ट्रीय समस्या' घोषित करने के बजाय वैज्ञानिक हस्तक्षेपों के साथ 'राष्ट्रीय समाधानों' की आवश्यकता पर जोर दिया। दीर्घकालिक पर्यावरणीय गिरावट ने बाढ़ के प्रभाव को और खराब कर दिया है, जो तटबंधों (embankments) जैसी वर्तमान बाढ़ प्रबंधन रणनीतियों की अपर्याप्तता को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु
- असम की बाढ़ ऊपरी इलाकों में वनों की कटाई और खनन जैसी मानवीय गतिविधियों से बढ़ गई है।
- पर्यावरणीय गिरावट ढलानों को अस्थिर करती है, जिससे कटाव और भूस्खलन बढ़ता है।
- मुख्यमंत्री ने बाढ़ प्रबंधन के लिए विज्ञान-समर्थित 'राष्ट्रीय समाधानों' का आह्वान किया है।
- तटबंधों जैसे वर्तमान बाढ़ नियंत्रण उपाय तेज बाढ़ के खिलाफ अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।
परीक्षा तथ्य
- प्रभावित जिले (2026 की बाढ़): Sivasagar, Charaideo, Jorhat।
- उल्लेखित नदी: Dikhow River।
- असम के मुख्यमंत्री: Himanta Biswa Sarma।
- मृत्यु की संख्या (2026 की बाढ़): 98।
- उल्लेखित मानवीय गतिविधियां: Mining, quarrying, deforestation, jhum cultivation।
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