भारत की FTA रणनीति को केवल वस्तुओं के व्यापार से परे सेवाओं और निवेश को शामिल करने के लिए पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।

यह लेख तर्क देता है कि भारत की Free Trade Agreement (FTA) रणनीति को एक मौलिक पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है, जो वस्तुओं के व्यापार पर संकीर्ण ध्यान से हटकर सेवाओं, निवेश और डिजिटल व्यापार को शामिल करे। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत के वर्तमान FTAs ने इसकी वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी को महत्वपूर्ण रूप से नहीं बढ़ाया है, जो कम बनी हुई है। यह लेख बताता है कि भारत के FTAs अक्सर जटिल rules of origin और व्यवसायों के बीच जागरूकता की कमी के कारण कम उपयोग दरों से ग्रस्त होते हैं। लाभों को अधिकतम करने के लिए, भारत को आपूर्ति-पक्ष की बाधाओं को दूर करना चाहिए, घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करना चाहिए, और FTAs पर बातचीत करनी चाहिए जो वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में गहरे एकीकरण की सुविधा प्रदान करते हैं, विशेष रूप से उच्च-विकास क्षेत्रों में।

मुख्य बिंदु

  • भारत की वर्तमान FTA रणनीति, जो मुख्य रूप से वस्तुओं पर केंद्रित है, ने इसकी वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी को महत्वपूर्ण रूप से नहीं बढ़ाया है।
  • मौजूदा FTAs की कम उपयोग दरें जटिल rules of origin और व्यवसायों के बीच अपर्याप्त जागरूकता के कारण हैं।
  • FTA लाभों को बढ़ाने के लिए, भारत को घरेलू आपूर्ति-पक्ष की बाधाओं को दूर करना चाहिए और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देना चाहिए।
  • भविष्य के FTAs व्यापक होने चाहिए, सेवाओं, निवेश और डिजिटल व्यापार को एकीकृत करते हुए वैश्विक मूल्य श्रृंखला एकीकरण को गहरा करने की सुविधा प्रदान करें।

परीक्षा तथ्य

  • पिछले दशक से वैश्विक वस्तु व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 1.7% बनी हुई है।
  • भारत की FTA उपयोग दर 5% और 25% के बीच अनुमानित है।
  • लेख ASEAN-India Trade in Goods Agreement (AITIGA) का उल्लेख करता है।
  • UAE के साथ Comprehensive Economic Partnership Agreement (CEPA) का हवाला दिया गया है।

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