भारत की ट्रिलियन-डॉलर जलवायु वित्त चुनौती: नेट-जीरो लक्ष्यों के लिए अंतर को पाटना
भारत को अपने Nationally Determined Contributions के लिए 2030 तक ₹162.5 ट्रिलियन ($2.5 ट्रिलियन) और नेट-जीरो उत्सर्जन के लिए 2070 तक $10.1 ट्रिलियन की आवश्यकता है, जो एक विशाल जलवायु वित्त अंतर को उजागर करता है। अकेले प्रमुख क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन के लिए 2030 तक $467 बिलियन की मांग है। लेख एक मजबूत वित्तपोषण रणनीति की आवश्यकता पर जोर देता है, जिसमें निवेश को मानकीकृत करने के लिए एक climate-finance taxonomy और हरित ऋण को प्रोत्साहित करने के लिए RBI द्वारा विभेदित पूंजी आवश्यकताएं शामिल हैं। State Climate Finance Facilities की स्थापना और sovereign green bonds का विस्तार पूंजी जुटाने और भारत के महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं।
मुख्य बिंदु
- भारत को अपने 2030 NDCs और 2070 नेट-जीरो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर जलवायु वित्त की आवश्यकता है।
- विशेष रूप से महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तपोषण अंतर मौजूद है।
- हरित निवेश को मानकीकृत करने और निवेशक विश्वास बनाने के लिए एक व्यापक climate-finance taxonomy आवश्यक है।
- RBI को हरित ऋण को 'ब्राउन' ऋण की तुलना में अधिक आकर्षक बनाने के लिए विभेदित पूंजी आवश्यकताओं को लागू करना चाहिए।
- State Climate Finance Facilities की स्थापना और sovereign green bond जारी करने में वृद्धि पूंजी जुटाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
परीक्षा तथ्य
- भारत की 2030 जलवायु वित्त आवश्यकता: ₹162.5 ट्रिलियन ($2.5 ट्रिलियन)।
- भारत की 2070 नेट-जीरो वित्त आवश्यकता: $10.1 ट्रिलियन।
- चार क्षेत्रों (steel, cement, power, road transport) के डीकार्बोनाइजेशन की लागत 2030 तक: $467 बिलियन।
- RBI की अनुशंसित वार्षिक हरित निवेश: 2030 तक GDP का कम से कम 2.5%।
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