संसद सदस्यों के लिए वाक् स्वतंत्रता (Freedom of Speech) पर संवैधानिक संरक्षण और सीमाएं

यह लेख Constitution के Article 105 के तहत संसद सदस्यों (MPs) को दी गई वाक् स्वतंत्रता की जांच करता है। हालांकि यह विशेषाधिकार विधायिका के सुचारू कामकाज के लिए आवश्यक है, लेकिन यह सदन के नियमों और Article 121 जैसे विशिष्ट संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन है। Speaker द्वारा शब्दों को 'हटाने' (expunging) के संबंध में हालिया विवादों ने MP के बोलने के अधिकार के उल्लंघन के बारे में चिंताएं बढ़ा दी हैं। लेखक का तर्क है कि प्रक्रिया के नियमों को संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं होना चाहिए और भावी पीढ़ी के लिए संसदीय बहसों की सुसंगतता और पवित्रता बनाए रखने के लिए शब्दों को हटाने की शक्ति का संयम से उपयोग किया जाना चाहिए।

मुख्य बिंदु

  • Article 105 Parliament में वाक् स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो सदस्यों को सदन में उनके बयानों के संबंध में कानूनी कार्रवाई से बचाता है।
  • Article 121 औपचारिक निष्कासन प्रस्ताव के अलावा Supreme Court या High Court के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है।
  • Speaker के पास Rule 380 के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड से असंसदीय या मानहानिकारक शब्दों को हटाने (expunge) की शक्ति है।
  • अत्यधिक विलोपन (expunction) किसी सदस्य के भाषण को असंगत बना सकता है और विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही के सिद्धांत को कमजोर करता है।

परीक्षा तथ्य

  • भारतीय संविधान का Article 105 MPs की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों से संबंधित है।
  • Article 121 Parliament में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है।
  • Lok Sabha के Rules of Procedure and Conduct of Business का Rule 380 Speaker को टिप्पणियों को हटाने की अनुमति देता है।

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