चल रही पुलिस जांच में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे को परिभाषित करना: 'Coercive Measures' पर बहस
Supreme Court ने हाल ही में चल रही पुलिस जांच में High Court के हस्तक्षेप की सीमाओं को स्पष्ट किया है। 'Neeharika Infrastructure' मामले में, न्यायालय ने जोर दिया कि पुलिस के पास संज्ञेय अपराधों (cognizable offenses) की जांच करने का वैधानिक अधिकार है। High Courts को केवल असाधारण मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए जहां कोई अपराध प्रकट नहीं होता है। अंतरिम आदेशों में अक्सर उपयोग किए जाने वाले वाक्यांश 'no coercive steps' की अस्पष्ट होने के लिए आलोचना की जाती है। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जांच पर रोक लगाने या गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करते समय High Courts को विशिष्ट कारण बताने चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि न्यायिक निरीक्षण वैध जांच प्रक्रिया को विफल न करे या न्याय के गर्भपात का परिणाम न हो।
मुख्य बिंदु
- पुलिस के पास CrPC के तहत संज्ञेय अपराधों की जांच करने का वैधानिक अधिकार और कर्तव्य है।
- High Courts को FIR रद्द करने की शक्ति का प्रयोग संयम और सावधानी के साथ करना चाहिए।
- Supreme Court ने फैसला सुनाया कि 'no coercive steps' के आदेश विशिष्ट होने चाहिए और विवेक के तर्कसंगत प्रयोग द्वारा समर्थित होने चाहिए।
- न्यायिक गैर-हस्तक्षेप सामान्य नियम है, और न्याय के गर्भपात को रोकने के लिए हस्तक्षेप अपवाद है।
परीक्षा तथ्य
- Neeharika Infrastructure (P) Ltd. versus State of Maharashtra (2021)
- Section 482 CrPC
- Section 528 BNSS
- संविधान का Article 226
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