तमिलनाडु और केरल विधानसभाओं में राज्यपाल के प्रथागत संबोधन पर संवैधानिक घर्षण

तमिलनाडु और केरल की हालिया घटनाओं ने Article 176 के तहत 'प्रथागत संबोधन' (customary address) को लेकर राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच बढ़ते तनाव को उजागर किया है। तमिलनाडु में, राज्यपाल R.N. Ravi ने 'भ्रामक बयानों' का हवाला देते हुए तैयार भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया, जिसके कारण DMK ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए एक संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव रखा। साथ ही, केरल के राज्यपाल Rajendra Vishwanath Arlekar ने कथित तौर पर कैबिनेट द्वारा अनुमोदित पाठ में बदलाव किया और केंद्र सरकार की आलोचनाओं को हटा दिया। ये कार्रवाइयां राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों बनाम राज्य कैबिनेट के मुखपत्र के रूप में कार्य करने के उनके संवैधानिक दायित्व पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं, जो संभावित रूप से संघीय सिद्धांतों और विधायी मिसालों को कमजोर करती हैं।

मुख्य बिंदु

  • Article 176 राज्यपाल को प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में विधानसभा को संबोधित करने का आदेश देता है।
  • यह संबोधन पारंपरिक रूप से राज्य कैबिनेट द्वारा तैयार किया जाता है और वर्ष के लिए सरकार की नीति और कार्यक्रम का प्रतिनिधित्व करता है।
  • तमिलनाडु और केरल के राज्यपालों ने हाल ही में अनुमोदित पाठ से विचलन किया है या उसे पढ़ने से इनकार कर दिया है, जिससे प्रक्रियात्मक गतिरोध पैदा हो गया है।
  • तमिलनाडु सरकार ने सदन के रिकॉर्ड में भाषण के केवल अनुमोदित संस्करण को दर्ज करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया।
  • आलोचकों का तर्क है कि राज्यपाल सदन के पटल पर व्यक्तिगत राय व्यक्त नहीं कर सकते क्योंकि वे निर्वाचित सदस्य नहीं हैं।

परीक्षा तथ्य

  • भारतीय संविधान का Article 176 राज्यपाल के विशेष संबोधन का आदेश देता है।
  • तमिलनाडु के राज्यपाल R.N. Ravi हैं; केरल के राज्यपाल Rajendra Vishwanath Arlekar हैं।
  • DMK राज्यपाल के संबोधन की प्रथा को समाप्त करने के लिए एक संवैधानिक संशोधन की मांग कर रही है।

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