भ्रष्टाचार और पूर्व मंजूरी: PC Act की Section 17A पर Supreme Court के खंडित फैसले का विश्लेषण
Supreme Court की दो न्यायाधीशों की पीठ ने Prevention of Corruption (PC) Act, 1988 की Section 17A की संवैधानिक वैधता पर खंडित फैसला सुनाया। यह धारा किसी लोक सेवक के खिलाफ उनके आधिकारिक क्षमता में लिए गए निर्णयों के लिए जांच या जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व मंजूरी को अनिवार्य बनाती है। Justice B.V. Nagarathna ने इस धारा को यह तर्क देते हुए रद्द कर दिया कि यह एक संरक्षित वर्ग बनाकर और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में बाधा डालकर Article 14 का उल्लंघन करती है। इसके विपरीत, Justice K.V. Viswanathan ने इस प्रावधान को बरकरार रखा और सुझाव दिया कि तटस्थता बनाए रखने के लिए सरकार के बजाय Lokpal जैसी स्वतंत्र संस्था को ऐसी मंजूरी देनी चाहिए। मुख्य असहमति को सुलझाने के लिए मामले को बड़ी पीठ (larger Bench) के पास भेज दिया गया है।
मुख्य बिंदु
- PC Act की Section 17A के तहत आधिकारिक कार्यों के लिए लोक सेवकों की जांच करने से पहले सरकार से पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है।
- Justice Nagarathna ने तर्क दिया कि यह प्रावधान जांच में एक अस्वीकार्य बाधा उत्पन्न करता है और संस्थानों के भीतर 'नीतिगत पूर्वाग्रह' को बढ़ावा देता है।
- Justice Viswanathan ने सुझाव दिया कि Lokpal मंजूरी देने के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण के रूप में कार्य कर सकता है, जो जवाबदेही और तुच्छ मुकदमों से सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखेगा।
- खंडित फैसला प्रशासनिक दक्षता और कानून के शासन के बीच संतुलन पर चल रही न्यायिक बहस को उजागर करता है।
परीक्षा तथ्य
- Section 17A को 2018 में Prevention of Corruption Act में शामिल किया गया था।
- इस मामले का शीर्षक 'The Centre for Public Interest Litigation (CPIL) vs Union of India' है।
- भारतीय संविधान का Article 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
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