बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना

पूर्व NSA M.K. Narayanan वैश्विक बदलावों के बीच भारत के विदेश नीति संघर्षों का विश्लेषण करते हैं, जिसमें Donald Trump की संभावित वापसी और चीन का बढ़ता प्रभाव शामिल है। लेख क्षेत्रीय मंचों में भारत के कथित अलगाव और गाजा समझौते जैसे प्रमुख शांति समझौतों से इसकी अनुपस्थिति को नोट करता है। यह भारत के 'मित्रहीन' पड़ोस की आलोचना करता है, जिसमें तुर्की जैसे देशों के साथ तनावपूर्ण संबंधों और अफगानिस्तान-पाकिस्तान संघर्ष के प्रभाव का हवाला दिया गया है। लेखक का तर्क है कि भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए अधिक लचीलापन और सरलता प्रदर्शित करनी चाहिए, विशेष रूप से जब चीन आर्थिक और साइबर प्रभाव के माध्यम से इंडो-पैसिफिक और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभुत्व स्थापित कर रहा है।

मुख्य बिंदु

  • भारत की विदेश नीति को ऐसी दुनिया के अनुकूल होने की आवश्यकता है जहां बहुपक्षवाद (multilateralism) अपना अर्थ खो रहा है और बहुपक्षीयता (plurilateralism) बढ़ रही है।
  • 'पड़ोस पहले' (neighborhood first) नीति को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में शत्रुतापूर्ण या अस्थिर शासनों से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • चीन एक प्राथमिक रणनीतिक पहेली बना हुआ है, टैरिफ और सीमा मुद्दों पर उसका 'चूहे-बिल्ली का खेल' जारी है।
  • पश्चिम एशिया में बड़े सुलह से भारत की अनुपस्थिति इसकी क्षेत्रीय प्रासंगिकता में संभावित गिरावट का संकेत देती है।

परीक्षा तथ्य

  • M.K. Narayanan (पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार)।
  • गलवान प्रकरण (जून 2020)।
  • तियानजिन (अगस्त 2025) राजनयिक हलके।

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