PLFS डेटा का विश्लेषण बिहार में निरंतर बेरोजगारी और निम्न श्रम भागीदारी को दर्शाता है
राजनीतिक वादों के बावजूद, बिहार में बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा बनी हुई है। 2023-2024 के Periodic Labour Force Survey (PLFS) के विश्लेषण से पता चलता है कि Worker Population Ratio (WPR) और Labour Force Participation Ratio (LFPR) में बिहार बड़े राज्यों में सबसे निचले स्थान पर है। राज्य की बेरोजगारी दर 5.2% (तिमाही) और 3% (वार्षिक) है। एक महत्वपूर्ण चिंता 'Discouraged Worker Effect' है, जहां खराब नौकरी की संभावनाओं के कारण व्यक्ति काम की तलाश बंद कर देते हैं, जिससे बेरोजगारी के आंकड़े भ्रामक रूप से कम हो जाते हैं। बिहार में आकस्मिक श्रमिकों (casual laborers) का अनुपात भी उच्च (23.8%) है और महिला कार्यबल भागीदारी (30.1%) बहुत कम है।
मुख्य बिंदु
- भारत के नौ बड़े, कम आय वाले राज्यों में बिहार का WPR और LFPR सबसे कम है।
- राज्य का महिला WPR राष्ट्रीय औसत और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों की तुलना में काफी कम है।
- कार्यबल का एक बड़ा प्रतिशत (23.8%) आकस्मिक श्रमिकों के रूप में लगा हुआ है, जो औपचारिक नौकरी के अवसरों की कमी को दर्शाता है।
- ‘Discouraged Worker Effect’ राज्य में बेरोजगारी संकट की वास्तविक सीमा को छुपाता है।
परीक्षा तथ्य
- 15-29 आयु वर्ग के लिए बिहार का महिला WPR 31.2% है, जबकि झारखंड में यह 49.3% है।
- बिहार में 23.8% श्रमिक आकस्मिक श्रमिक हैं, जो तुलनात्मक राज्यों में ओडिशा के बाद सबसे अधिक है।
- 5 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए बिहार की साक्षरता दर 73.2% है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।
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