सुप्रीम कोर्ट विधेयकों पर सहमति देने के लिए राज्यपालों की संवैधानिक समय-सीमा की जांच कर रहा है

सुप्रीम कोर्ट राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर सहमति रोकने या देरी करने के लिए राज्यपालों की विवेकाधीन शक्तियों के संबंध में एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है। संविधान के Article 200 के तहत, विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं, लेकिन पाठ में समय-सीमा निर्दिष्ट नहीं है। इससे कई विपक्षी शासित राज्यों में 'पॉकेट वीटो' की स्थिति पैदा हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों और Sarkaria तथा Punchhi Commissions जैसे पिछले आयोगों ने निर्णयों के लिए निश्चित समय-सीमा (जैसे, छह महीने) की सिफारिश की है। मई 2025 में कोर्ट के आगामी फैसले से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि क्या ऐसी देरी पर न्यायिक समीक्षा (judicial review) लागू की जा सकती है।

मुख्य बिंदु

  • Article 200 राज्यपाल के विकल्पों को रेखांकित करता है: सहमति देना, सहमति रोकना, पुनर्विचार के लिए वापस करना, या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना।
  • Article 163(1) कहता है कि राज्यपाल को आम तौर पर मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना चाहिए।
  • Sarkaria Commission (1987) और Punchhi Commission (2010) ने राज्यपाल के कार्यालय के राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए समय-सीमा का सुझाव दिया था।
  • सुप्रीम कोर्ट ने पहले Shamsher Singh मामले (1974) में यह माना है कि राज्यपाल सहमति देने में व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग नहीं करते हैं।

परीक्षा तथ्य

  • प्रासंगिक संवैधानिक अनुच्छेद: Article 200 (विधेयकों पर सहमति) और Article 163 (विवेकाधीन शक्तियां)।
  • आयोग: Sarkaria Commission (1987) और Punchhi Commission (2010)।
  • प्रमुख मामला: Shamsher Singh vs State of Punjab (1974)।

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