न्यायिक प्रोत्साहन (Judicial Nudge): Supreme Court ने विधायी विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपालों के लिए तीन महीने की समय सीमा तय की
Supreme Court ने राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों (Bills) पर अंतिम निर्णय लेने के लिए राज्यपालों (Governors) के लिए तीन महीने की समय सीमा निर्धारित की है। यह हस्तक्षेप 'रुके हुए विधायी कार्यों' के मुद्दे को संबोधित करता है जहां राज्यपाल Article 200 के तहत विकल्पों का प्रयोग किए बिना वर्षों तक विधेयकों को रोके रखते हैं। लेख Article 163 के तहत 'विवेक' (discretion) के दायरे पर चर्चा करता है, यह स्पष्ट करते हुए कि राज्यपालों को आम तौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना चाहिए। यह रेखांकित करता है कि Article 355 संघ पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य लगाता है कि राज्य सरकारें संविधान के अनुसार कार्य करें, जो संवैधानिक कर्तव्यों की उपेक्षा होने पर न्यायिक हस्तक्षेप को उचित ठहराता है।
मुख्य बिंदु
- Article 200 राज्यपाल को चार विकल्प प्रदान करता है: सहमति देना, सहमति रोकना, पुनर्विचार के लिए वापस करना, या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना।
- कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्यपाल विधायी मामलों में मंत्रिपरिषद से स्वतंत्र होकर कार्य नहीं कर सकते।
- 3 महीने की समय सीमा का उद्देश्य राज्यों में विधायी मशीनरी को रुकने से रोकना है।
- Article 355 की व्याख्या संघ को यह सुनिश्चित करने की अनुमति देने के लिए की जा सकती है कि राज्यपाल अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करें।
परीक्षा तथ्य
- Article 200: राज्यपाल द्वारा विधेयकों को सहमति।
- Article 163: राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करेंगे।
- Article 355: राज्यों की रक्षा करना संघ का कर्तव्य।
- संबंधित मामले: Shamsher Singh (1974) और Nabam Rebia (2016)।
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