एम.एस. स्वामीनाथन को श्रद्धांजलि: भारत के भविष्य के लिए हरित क्रांति से सबक
यह लेख एम.एस. स्वामीनाथन को श्रद्धांजलि देता है, जिसमें 1960 के दशक की हरित क्रांति के दौरान भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। यह भविष्य के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रमुख सबक निकालता है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, नौकरशाही नियंत्रण में कमी और सीधे वैज्ञानिकों की बात सुनने वाले राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेख में कहा गया है कि नए गेहूं के बीजों के परीक्षणों के वित्तपोषण के लिए सुब्रमण्यम का समर्थन महत्वपूर्ण था, जिसे शुरू में प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। यह भी बताया गया है कि हरित क्रांति एक सफलता थी, लेकिन अत्यधिक पानी और उर्वरक के उपयोग से उत्पन्न पर्यावरणीय मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं, और भारत का कृषि अनुसंधान वित्तपोषण और गुणवत्ता चीन से पीछे है।
मुख्य बिंदु
- एम.एस. स्वामीनाथन 1960 के दशक में हरित क्रांति के दौरान भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता में सहायक थे।
- प्रमुख सबकों में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देना और अनुसंधान के लिए नौकरशाही बाधाओं को कम करना शामिल है।
- सी. सुब्रमण्यम द्वारा अनुकरणीय राजनीतिक नेतृत्व को जटिल तकनीकी मुद्दों पर सीधे वैज्ञानिकों के साथ जुड़ना चाहिए।
- हरित क्रांति, हालांकि सफल रही, लेकिन अत्यधिक पानी और उर्वरक के उपयोग के कारण पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हुईं, जिन्हें अभी तक पूरी तरह से संबोधित नहीं किया गया है।
- भारत का कृषि अनुसंधान वर्तमान में वित्तपोषण और संस्थागत गुणवत्ता में चीन से पीछे है, जो भविष्य के जलवायु परिवर्तन अनुकूलन को प्रभावित करता है।
परीक्षा तथ्य
- एम.एस. स्वामीनाथन, जिन्हें भारत में 'हरित क्रांति का जनक' कहा जाता है।
- हरित क्रांति ने 1960 के दशक में भारत में खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल की।
- लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने नए गेहूं के बीजों के आयात का समर्थन किया।
- भारत कृषि GDP का 0.43% R&D पर खर्च करता है, जबकि चीन इसका दोगुना खर्च करता है।
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