मालेगांव विस्फोट के आरोपी विश्वसनीय सबूतों की कमी और प्रक्रियात्मक खामियों के कारण बरी
एक Special National Investigation Agency (NIA) Court ने 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया, जिसमें भाजपा नेता प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल थे। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष विश्वसनीय और स्वीकार्य सबूत प्रदान करने में विफल रहा, जिसमें विस्फोटक उपकरण के 'conscious possession' की कमी, प्राथमिक फोरेंसिक विश्लेषण की अनुपस्थिति और प्रक्रियात्मक खामियों के कारण MCOCA के तहत दर्ज किए गए अस्वीकार्य इकबालिया बयान शामिल थे। यह फैसला जांच में महत्वपूर्ण विफलताओं पर प्रकाश डालता है और प्रस्तुत किए गए सबूतों की अखंडता के बारे में सवाल उठाता है, जिससे पीड़ितों के परिवार एक स्वतंत्र अपील पर विचार कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु
- 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में सभी सात आरोपी, जिनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल थे, बरी हो गए।
- NIA Court ने अभियोजन पक्ष द्वारा विश्वसनीय और स्वीकार्य सबूत पेश करने में विफलता का हवाला दिया।
- बरी होने के मुख्य कारणों में विस्फोटक उपकरण के 'conscious possession' की कमी और प्राथमिक फोरेंसिक विश्लेषण की अनुपस्थिति शामिल थी।
- MCOCA के तहत दर्ज किए गए इकबालिया बयानों को प्रक्रियात्मक खामियों और 'application of judicial mind' की कमी के कारण अस्वीकार्य माना गया।
- पीड़ितों के परिवार Bombay High Court में एक स्वतंत्र अपील दायर करके कानूनी उपायों की तलाश करने का इरादा रखते हैं।
परीक्षा तथ्य
- मालेगांव बम विस्फोट 29 सितंबर, 2008 को हुआ था।
- आरोपियों में प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल थे।
- IPC, UAPA, 1967 और Explosive Substances Act, 1908 के तहत आरोप तय किए गए थे।
- Maharashtra Control of Organised Crime Act (MCOCA), 1999 के तहत इकबालिया बयान अस्वीकार्य कर दिए गए थे।
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