समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता पर बहस: भारतीय संविधान के मूल मूल्य
यह लेख तर्क देता है कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की भावना के आंतरिक अंग हैं, न कि 42nd Amendment Act, 1976 से केवल अतिरिक्त। यह RSS के इन शब्दों को हटाने के आह्वान की आलोचना करता है, इसे गणतंत्र की मूलभूत दृष्टि पर हमला मानता है। प्रस्तावना, Directive Principles of State Policy (Articles 38, 39, 41-43), और Fundamental Rights (Articles 14-16, 25-30) सभी इन मूल्यों को दर्शाते हैं। Kesavananda Bharati case (1973) में स्थापित Basic Structure Doctrine, पुष्टि करता है कि ये सिद्धांत अलंघनीय हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के भाषण भी इन मूल्यों की नींव के रूप में समानता को सुदृढ़ करते हैं, जिससे वे भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने से अविभाज्य हो जाते हैं।
मुख्य बिंदु
- समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान में गहराई से निहित मूलभूत मूल्य हैं, न कि केवल 42nd Amendment से अतिरिक्त।
- प्रस्तावना, Directive Principles of State Policy और Fundamental Rights स्पष्ट रूप से इन सिद्धांतों को समाहित करते हैं।
- 1973 में स्थापित Basic Structure Doctrine, इन मूल संवैधानिक मूल्यों को परिवर्तन से बचाता है।
- इन शब्दों को हटाने के आह्वान को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य को कमजोर करने और भारत की उपनिवेश-विरोधी विरासत को फिर से लिखने के प्रयास के रूप में देखा जाता है।
परीक्षा तथ्य
- "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द 42nd Amendment Act, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए थे।
- Basic Structure Doctrine को 1973 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा Kesavananda Bharati case में पेश किया गया था।
- Fundamental Rights जैसे Articles 14, 15, 16, 25-28, 29, 30 समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को दर्शाते हैं।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर के 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा को दिए गए अंतिम भाषण ने समानता पर जोर दिया था।
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