व्यापार समझौते में देरी के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया ₹90.15 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹90.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। विशेषज्ञ इस गिरावट का कारण भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की पिछले वर्षों की तुलना में कम आक्रामक हस्तक्षेप की वर्तमान रणनीति को बताते हैं। भारतीय शेयरों को बेचकर अमेरिकी, यूरोपीय और जापानी बाजारों में जाने वाले विदेशी निवेशकों ने भी डॉलर की निकासी की स्थिति पैदा की है। हालांकि कमजोर रुपया भारतीय वस्तुओं को विदेशों में सस्ता बनाकर निर्यातकों की मदद करता है, लेकिन यह आयात की लागत को बढ़ाता है, हालांकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर इसके प्रभाव को वर्तमान में अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रबंधनीय माना जा रहा है।
मुख्य बिंदु
- रुपये ने प्रति डॉलर ₹90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ दिया और ₹90.15 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ।
- भारतीय इक्विटी बाजारों से विदेशी बाजारों में पूंजी का पलायन रुपये की गिरावट का एक प्रमुख कारक है।
- RBI कम हस्तक्षेप कर रहा है, और गिरावट को रोकने के लिए पिछले अवधियों की तुलना में अपने भंडार से कम डॉलर बेच रहा है।
- रुपये के अवमूल्यन से आयात महंगा हो जाता है लेकिन वैश्विक बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।
परीक्षा तथ्य
- रुपया प्रति USD ₹90.15 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया।
- RBI ने मुद्रा प्रबंधन के लिए अप्रैल से सितंबर तक औसतन 10.5 बिलियन डॉलर प्रति माह बेचे।
- रुपये के लिए मनोवैज्ञानिक बाधा ₹90 मानी गई थी।
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