अनियमित विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को विनाश की कगार पर धकेल रही हैं
हिंदू कुश हिमालय में हालिया आपदाएं, जिनमें हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन शामिल हैं, केवल जलवायु परिवर्तन के बजाय अनियमित निर्माण से जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि हिमालय दुनिया के सबसे युवा पर्वत हैं और स्वाभाविक रूप से अस्थिर हैं। तेजी से बुनियादी ढांचे के विकास, जैसे जलविद्युत परियोजनाओं और राजमार्गों के प्रसार ने क्षेत्र की वहन क्षमता (carrying capacity) की अनदेखी की है। सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया है कि 'विकास' अक्सर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बदतर बना देता है। सिफारिशों में लोकतांत्रिक सार्वजनिक परामर्श आयोजित करना, वहन क्षमता का आकलन करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि असुरक्षित, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में महत्वपूर्ण संरचनाएं न बनाई जाएं।
मुख्य बिंदु
- हिमालय उच्च-ऊर्जा वाले वातावरण हैं जो अस्थिरता और मानवीय गतिविधियों तथा वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता की विशेषता रखते हैं।
- अकेले हिमाचल प्रदेश में 1,144 जलविद्युत संयंत्र हैं, जिनमें से कई उचित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के बिना बनाए गए हैं।
- भारतीय हिमालय में औसत तापमान वैश्विक औसत की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बर्फबारी कम हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
- ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) एक बड़ा खतरा हैं, जिसमें पूरे हिंदू कुश क्षेत्र में 25,000 से अधिक हिमनद झीलों की पहचान की गई है।
परीक्षा तथ्य
- हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत संयंत्रों की संख्या: 1,144।
- हिंदू कुश हिमालय में हिमनद झीलों की संख्या: 25,000 से अधिक।
- सुप्रीम कोर्ट की बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन।
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