वैश्विक प्लास्टिक संधि पर सहमति मुश्किल; भारत दायित्वों पर स्पष्टता चाहता है
वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए वार्ता चुनौतियों का सामना कर रही है, नैरोबी में तीसरे दौर की वार्ता के बाद भी सहमति नहीं बन पाई है। भारत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी साधन का समर्थन करता है लेकिन अपने दायित्वों पर स्पष्टता चाहता है, विशेष रूप से 'common but differentiated responsibilities' सिद्धांत के संबंध में। देश विकासशील राष्ट्रों के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता पर भी जोर देता है और प्लास्टिक उत्पादन के लिए अनिवार्य कमी लक्ष्यों का विरोध करता है, इसके बजाय प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करता है। चर्चाओं का उद्देश्य प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र, उत्पादन से लेकर निपटान तक, को संबोधित करना है।
मुख्य बिंदु
- वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए वार्ता सहमति तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है, जिसमें दायरे और दायित्वों पर प्रमुख असहमति है।
- भारत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि का समर्थन करता है लेकिन विकासशील राष्ट्रों के लिए 'common but differentiated responsibilities' के सिद्धांत पर जोर देता है।
- भारत अनिवार्य प्लास्टिक उत्पादन कमी लक्ष्यों का विरोध करता है, इसके बजाय प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- संधि के प्रावधानों को लागू करने के लिए विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता भारत की एक महत्वपूर्ण मांग है।
परीक्षा तथ्य
- वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए तीसरे दौर की वार्ता नैरोबी में आयोजित की गई।
- भारत 'common but differentiated responsibilities' के सिद्धांत की वकालत करता है।
- संधि का उद्देश्य प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र को संबोधित करना है।
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